अपने बचपन मे हूँ, खुद को निहार रहा हूँ,
नन्हे पांव से एक बच्चा दुनिया नाप रहा है,
गिरता है, खड़ा होकर फिर चलता है वो,
सोचता हूँ, चोट न लग जाये, कोई तो सम्हालो इसे।
ये क्या ! कुछ दिनों मे वो चल रहा है तन कर,
सम्हाल लिया है खुद को, पहली शिक्षा पाकर।
तोतली है बोली, शब्द भी है खाली खाली,
सामने है जो भी उनकी नक़ल अभी कर रहा है,
कुछ बोलना था, वो कुछ और ही बोल रहा है,
सोचता हूँ, शब्द जुबान पर फिसल रहे हैं, कोई तो सम्हालो इसे।
ये क्या ! कुछ ही दिनों मे शब्द है उसकी पकड़ मे,
सम्हाल लिया है खुद को, दूसरी शिक्षा पाकर।
सामने कौन है, पहचान नहीं पा रहा है,
किसी ने कहा है पापा, वो भी वही दुहरा रहा है,
चेहरे और रिश्तो की समझ है अभी कम ,
किसी का सन्देश किसी और को पहुंचा रहा है,
सोचता हूँ, कैसी खिचड़ी पका रहा है, कोई तो सम्हालो इसे।
ये क्या ! कुछ ही दिनों मे रिश्तो को समझ गया है वो,
सम्हाल लिया है खुद को, तीसरी शिक्षा पाकर।
पापा खेतों मे, माँ खाना पका रही है ,
जाता है सबके पास, उनके हाथ बटा रहा है,
कोई काम कर नहीं पाता, कोशिश बस कर रहा है,
सोचता हूँ, सबके काम बिगाड़ रहा है, कोई तो सम्हालो इसे।
ये क्या ! कुछ ही दिनों मे सीख लिया है काम भी करना,
सम्हाल लिया है खुद को, चौथी शिक्षा पाकर। अब तो तीन बरस का हो चूका हूँ मैं,
चलता बोलता भी हूँ, रिश्तो की समझ भी है,
काम भी कर सकता हूँ, चलो अब पाठशाला चलते है।
