मुम्बई पोस्टिंग

बैंक में स्थानांतरण बहुत ही आम है ।तीन साल में एक बार तो होना ही है।और अगर आपने अपने टारगेट पूरा नहीं किये तो इस समय सीमा से पहले भी स्थानांतरण हो सकता है। हमने जब ज्वाइन किया था तो हमसे पहला फार्म फरवाया गया था कि हम भारत में कहीं भी पोस्टिंग के लिए तैयार हैं। मेरी ये कहानी है मुम्बई पोस्टिंग की.

मुझे 31.06.2018 को चिट्ठी मिली की मुझे  04 जुलाई को मुम्बई जोनल आफिस रिपोर्ट करना है । स्थानांतरण की चिट्ठी मिलने के बाद में उदास बिल्कुल नहीं था । हल्की-हल्की खुशी मिल रही थी मुम्बई शहर के बारे में सोचकर बड़ा शहर ,भारत की आर्थिक राजधानी ,साथ ही रंगीन बालीवुड ये मुझे रोमांचित कर रहे थे । इसके अलावा एक बहुत बड़ी खुशखबरी थी दिल में, 7 सालो के लम्बे अंतराल के बाद  मुझे प्रमोशन मिला था। अब मैं मैनेजर बन चुका था.

बैंक के इतर मेरी एक छोटी सी दुनिया है, मैं ,मेरी पत्नी और हैप्पी और खुशी । ये दोनों मेरे बच्चों के नाम है। लोगो की जुबानी सुनी थी बैंक वालों के पास खुद के लिए वक्त नहीं बचता, सोचा अगर जुबान पर हमेशा हैप्पी और खुशी जैसे शब्द हो तो कुछ खुशी तो अपने हिस्से में आ ही जाएगी. इसलिए बच्चों के नाम मैनें हैप्पी  और खुशी रख दिया। मेरे पास मेरी सैलरी के आलावा आमदनी का कोई दूसरा जरिया नहीं है । इसी से महीने का खर्च और फ्यूचर की भी प्लानिंग  करनी होती है। मैं बच्चो और परिवार के लिए थोड़े पैसे हर महीने निवेश करता हूँ।

स्थानांतरण चिट्ठी मिलने के बाद मैंनें पैकिंग शुरू कर दिया । पैकर वाले से बात हुई तो वो 25000 में मुम्बई पहुचाने को राजी हुआ। जून महीने की सैलरी मुझे मिल चुकी थी । कुछ निवेश करने के बाद मेरे पास सिर्फ 35000 रूपये बचे थे । इसी में मुझे पूरे महीने का खर्चा चलाना था और साथ में मुझे स्थानांतरण का खर्च भी उठाना था। बैंक में स्थानांतरण के लिए एडवांस खर्च भी लिया जा सकता था।

लेकिन मेरे साथ हुआ ये की मुझे बस एक दिन पहले ही सैलरी मिली थी इसलिए मैनेजर ने जब एडवांस के बारे में मुझसे पुछा तो मैनें मना कर दिया लेकिन महीने के निवेश जो महीने के शुरूआती दिनों में करना होता है उसके बाद मेरे पास बस यही 35000 रूपये बचे थे । मैं थोड़ा सोच में पड़ गया बैंक में काम करते हुए हमने यही सीखा कि कुछ भी हो जाए परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं हो फिर भी कोशिश करनी है। अगर आपने बैंक ब्रांचेज में रिकवरी में काम किया होगा तो आप यह समझ सकते हैं ।

1 जुलाई की सुबह मैं फ्लाइट की टिकट ले पाने की स्थिती में नहीं था क्योंकि ये लगभग 15000 रूपये का था ।मैनें बक्सर स्टेशन पहुँच कर ट्रेन की टायमिंग पता किया और शाम वाली ट्रेन जो 7.30 में थी उसका इंतजार करने लगा। मोबाइल में गेम और  विडियोज देखते हुए समय कटा । ट्रेन 3 घंटे देर से स्टेशन पर आ चुकी थी ।

मैनें जेनरल क्लास का टिकट लिया था इसलिए स्लिपर या AC में जा नहीं सकता था और जेनरल डिब्बे की भीड़ मुझे सता रही थी । ट्रेन जब रूकी तो हिम्मत जुटा कर जेनरल डिब्बे की तरफ भागा लेकिन उससे पहले ही स्टोर रूम कम्पार्टमेंट दिखा जिसमे लोग फटाफट चढ़ रहे थे ,मै भी जल्दी-जल्दी इसी डिब्बे में चढ़ गया । 

इस छोटे से स्टोर कम्पार्टमेंट में भी काफी भीड़ थी। मैं डिब्बे में ऊपर बने रैक जिसमे सामान्यत: छोटो-छोटे सामान के डब्बे रखे जाते हैं उसपर चुपचाप किनारे दुबका था। मेरेसाथ 6-7 लोग उस रैक पर बैठे थे । ट्रेन स्टेशन से निकल चुकी थी। मौसम ठंडा था।  बाहर हल्की-हल्की फुहार वाली बारिश हो रही थी। मैने कानो में इयरफोन लगाया और दिवार से सटे बैठ गया।

मेरे साथ बैठ कुछ लोग आपस में बातें कर रहे थे ।उनकी चर्चा का विषय राजनिती ही था। सामान्यत:बिहार में लोग राजनितिज्ञ हो या ना हो राजनिति में दिलचस्पी जरूर रखते हैं। मैं कभी-कभी इयpर फोन हटाकर उनकी बातें भी चुपचाप सुन लेता था। गाड़ी अपने रफ्तार में चले जा रही थी। बीच-बीच में गाड़ी कई स्टेशनों पर रूकी मगर भीड़ कम नहीं हुई। अब भी मेरे साथ,थी। कुछ देर में मैं बैठे-बैठे ही सो गया। कभी-कभी ट्रेन जब जोर से हिचकोलो खाती तो नींद खुल जाती और मैं अपने उपर वाली छत को जोर से पकड़ लेता ताकि मैं नीचे न गिर जाऊँ। मुझे तेज निंद आ रही थी।

5-6 घंटे गुजर चुके थे। अब सुबह होने को थी।ट्रेन बनारस स्टेशन पर खड़ी थी। चाय वाले लगातार चाय-चाय की आवाज लगा रहे थे। मेरी भी निंद खुल चुकी थी। मैने देखा अब कम्पार्टमेन्ट में कम ही लोग थे। मेरे रैक पर अब कोई नहीं था,मैं अकेला ही उस पर पदा था। मैनें एक चाय वाले से” रामदुलारी चाय” का एक कप लिया और पीने लगा। बिहार -यूपी में कई चाय वाले अपने चाय को इसी नाम से बेचते हैं।

चाय पीने के बाद मैं पैर फैलाकर रैक पे ही सो गया। कई घंटो के बाद मुझे ये मौका मिला था इसलिए आराम पा कर तुरंत निंद आ गयी। लेकिन मैं ज्यादा देर सो नहीं पाया,पेटमें हो रहे हल्के हल्के दर्द के कारण मेरी निंद खुल गयी। मुझे शौचालय जाना था। ये विचार आते ही मेरी टेंशन बढ़ गयी क्योंकि इस कम्पार्टमेंट तो शौचालय था ही नहीं। अगला स्टेशन मुगलसराय आने वाला था,मैं इंतजार करने लगा। 

स्टेशन पर गाड़ी रूकते ही मैं जेनरल डिब्बे की तरफ भागा। डिब्बे में भीड़ बहुत थी चढ़ पाना बेहद मुश्किल था। अंदर खड़े होने को लिए भी जगह नहीं था। मैं शौचालय तक पहुचा तो वहाँ पहले से ही 5-6 लोग लाइन में खड़े थे। मेरे पास कोइ विकल्प नहीं था। 30-35 मिनट बाद मेरा नम्बर आया। मैने ब्रश और अर्ध स्नान भी कर लिया ताकि दिन भर फ्रेश रह सकू। मैं अब डिब्बे की अंदर की ओर बढ़ने लगा।

थोड़ा अंदर जाने पर एक जगह थोडी सी खड़े होने की बराबर जगह थी मैं वहाँ खड़ा हो गया । पर शायद वहाँ बैठी एक महिला को यह रास नहीं आया। वह चिल्लाने लगी सब सर पर ही खड़े हुए जा रहे हैं पंखे की हवा तक नहीं आ रही है। मैं उसकी बातोंको अनसुना कर वहीं खड़ा रहा क्योंकि किसी दूसरी जगह पर खड़े होना भी मुश्किल था। काफी देर खड़ा रहने के बाद एक जगह खाली हुआ था मैं खुश हो गया। यह कोई सीट नहीं था फर्श पर बैठा एक आदमी अपनी जगह से उठा था। मैं बिना देर किये फर्श पर बैठ गया। पैरों में भी खड़ा -खड़ा दर्द होने लगा था। मैं अब बैठ कर थोड़ा आराम महसूस कर रहा था। आधे घंटे बाद वह आदमी वापस आ गया और मुझसे उठने के लिए कहने लगा। मैं फिर से खड़ा हो गया ।

भारतीय रेलवे के इस जेनरल डिब्बे की आंखो देखी मैं बयां करना चाहुँगा-

पूरा डिब्बा भरा पड़ा था चाहे वह सीट हो ,उपर वाली रैक हो ,या फर्श। हाथ- पैर हिलाने की भी जगह नहीं थी। ऊपर बैठे लोग तेज आवाज में मोबाइल बजा रहे थे ,कई चाचा लोग बिड़ी सुलगाये हुए थे, कई बहने और बच्चे मुँगफली खा रहे थे और छिलके वहीं गिरा रहे थे। इनके अलावा कुछ लोग ये साबित करना चाहते थे की यो हाई क्लास के लोग हैं वो तो आज टिकट कम्फर्म नहीं हुआ इसलिए इस डिब्बे में आना पड़ा।

इनके अलावा कुछ लोग इस डिब्बे के आदी जान पड़ते थे। इस डिब्बे में पान-मसाला, गूटका  खाने वाले ऐसे लोग भी हैं जो हर दस मिनट में खिड़की या दरवाजे पर आ कर थूक आते हैं। इसके अलावे चाय-समोसेवाले हैं जो बड़ी सफाई से भीड़ के बीच डिब्बे में घूमकरचाय-समोसा बेचते हैं और ट्रेन खुलने के पहले उतर जाते हैं। अजब की कलाबाजी और साहस है इनमें।

शाम का वक्त हो चूका था मैनें समोसे और पानी की एक बोतल खरीदी और भूख मिटाया और एक प्लास्टिक की दरी खरीदी जो शायद इसी डिब्बे के लिए इजाद किया गया था । मैं फर्श पर चटाई बिछा कर बैठ गया और लोगों के साथ गप शप में शामिल हो गया। अब दिन भर की भड़ास उन लोगो पर अर्थशास्त्र का ज्ञान झाड़ कर निकाला । एक बैंकर इतनी आर्थिक जानकारी तो रखता ही है कि अपना लोहा मनवा सके।

मेरी आँखे अब भारी होने लगी थी । मैं बैठे ही झपकियां लेने लगा । बाकी लोगो की भी यही स्थिति थी। जो जहाँ बैठा था वही सोने की कोशिश कर रहा था। किसका सर किसका पैर किसी को कुछ पता नहीं चल रहा था । डिब्बे में सुबह 4 बजे से ही चाय वाला लोगो को जगाने लगा । मैं भी जागकर बैठ चुका था। मैं फर्श से अपनी जगह से दूर पहुँच चुका था। मेरी चटाई पर एक महिला ने कब्जा कर रखा था । उसके गोद में एक बच्चा  भी था। ना जाने वो किस स्टेशन पर चढ़ी और मेरी फर्श वाली जगह पर आकर बैठ गई। 

शौचालय के बाहर बहुत शोर हो रहा था। मुझे भी शौचालय जाना था। जब मैं वहाँ तक गय़ा तो क्या देखता हूँ की  कुछ लोगों ने शौचालय को हाइजेक कर रखा है। हुआ यूं कि रात में जो लोग डिब्बे में चढ़े , अंदर जगह तो थी नहीं उन्होने शौचालय में ही जगह बना लिया। उन्हाने शौचालय की स्लाइडिंग खिड़की को निकाल कर  पैखाने के सीट के उपर रख दिया और उसके उपर बैठ कर सो गये।

अब वो वहाँ से निकले को तैयार ही नहीं थे। बड़े शोर शराबे के बाद शौचालय को खाली कराया गया। दोनो शौचालय के चालु होने के बाद ही स्थिति सामान्य हो पाई। मैने भी हाथ मुहँ धोया और वापस आ गया। पुणे स्टेशन अब पीछे छुट छुका था। अब आने वाले स्टेशनों पर लोग उतरने लगे थे ।कुछ सीट भी खाली हो चुकी थी। अब मैं सीट पर बैठ सकता था।

मैं मुम्बई पहली बार आ रहा था । यहाँ के बारे में मुझे ज्यादा पता नहीं था। मैने अपने सामने बैठे सज्जन के साथ मुम्बई की बात छेड़ दी। बातो-बातो में पता चला कि स्टेशन से मुम्बई के किसी भी जगह जाने के लिए टैक्सी मिल जाती है,लेकिन वो नये लोगों से मनमाना चार्ज लेते हैं।मुझे तब तक यहाँ चलने वाले “ओला उबर”की सर्विसेस के बारे में ज्यादा जानकरी नहीं थी।

एक अहम बात और थी कि यहाँ हर रूटके लिए लोकल ट्रेन भी है,जिसमे कम पैसे में सफर किया जा सकता है लेकिन उनमें भीड़ बहुत रहती है। सावधानी से सफर करना पड़ता है। बातो-बातों में समय कैसे बीता पता नहीं चला। मैं 32 घंटो के सफर के बाद मुम्बई पहुच चुका था। 

मुम्बईके लोकमान्य तिलक टर्मिनल से निकल कर तिलक स्टेशन पहुँचा । स्टेशन पर मौजूद लोगों से पता किया की वर्ली तक कैसे पहुचाँ जा सकता है, तो पता चला  दो लोकल ट्रेन और बस लेकर जोनल आँफिस तक पहुँच सकते हैं। मैं तिलक नगर स्टेशन से फिर से ट्रेन में सवार हो गया। ट्रेन में चढ़ते ही मुझे भीड़ का अंदाजा हो गया। सुबह के आँफिस का वक्त था और लोकल खचाखच भरी थी। ऐसा लगा की मैं फिर से बक्सर पहुँच गया हूँ और मुम्बई के लिए ट्रेन ले रहा हूँ।

खैर मैने किसी तरह एक कोने में अपने लिए जगह बनाया और खड़ा हो गया । अगले स्टेशन कुर्ला में ही उतर कर अगली लोकल लेनी थी। स्टेशन पहुँचने से पहले ही लोग  गेट के पास आपा- धापी करने लगे थे। मैं भी गेट की ओर बढ़ा ।स्टेशन पर ट्रेन रूकते ही लोग ज्लदी में उतरने लगे । मैं भी उनके पीछे -पीछे उतर गया ।लेकिन मेरे उतरते ही चढ़ने वाले लोग ट्रेन पर टूट पड़े। जो उतरते वक्त पीछे रह गये थे बड़ी मुशिकल से ट्रेन से निकल पाये। कुर्ला स्टेशन पर एक ईंच भी जगह नहीं थी हर तरफ लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। शायद मैनें इतनी भीड़ पहले कभी नहीं देखा था। 

मुझे अगले स्टेशन दादर तक जाने के लिए अगली ट्रेन लेनी थी। मैने लोगो से पूछा कि दादर के लिए ट्रेन किस प्लेटफार्म पर आएगी पर सब भागने में इतने बिजी थे कि किसी  ने कुछ नहीं बताया। मैं भी उस भीड़ में शमिल हो गय़ा और ब्रिज पर चढ़ने लगा। ब्रिज के उपर पहुँचा तो नोटिस बोर्ड पर देखा कि दादर तक जाने वाली ट्रेन अगले प्लेटफार्म पर आने वाली थी, थोड़ी ही देर में दादर तक के लिए फास्ट लोकल आ गई।

इस ट्रेन में चढ़ने के लिए बिल्कुल भी मेहनत नहीं करनी पड़ी। गेट के सामने जाते ही लोगो ने पीछे से धक्के दे कर ट्रेन में चढ़ा दिया और अगले स्टेशन आते ही वैसे ही उतार दिया । जिन्होने मुम्बई के लोकल में सफर किया है वही इस बात को समझ सकता है। मैं भीड़ से भरे दादर स्टेशन से बाहर निकल ।वहाँ मौजूद लोगों से बस के बारे में पता किया और बस में सवार हो गया। अगले 15 मिनट में मैं पासपोर्ट आँफिस के बगल में अपने जोनल आँफिस पहुँच चुका था ।

मैं अपने जोनल आँफिस पहुँचने वाला अंतिम आदमी था, जिसे 04 जुलाई को रिपोर्ट करना था। मेरे सारे मित्रगण जिनका स्थानांतरण मुम्बई हुआ था पहले ही फ्लाइट से मुम्बई आ चुके थे। उन्हें नई पोस्टिग भी मिल चुकी थी। हाँलाकि उस दिन मेरी नई पोस्टिंग निश्चित नहीं की जा सकी। मुझे बस रहने के लिए बैंक एकोमीडेशन एलाँट कर दिया गया। मुझे मलाड के सती मार्ग स्थित क्वाटर में एक कमरा मिलना था। मुझसे बोला गया आज मलाड में कमरा ले लिजिए और कल यहीं जोनल आँफिस में रिपोर्ट किजिए।

मैं अपना बैग लेकर वापस से निकल पड़ा। मेरे पास वहाँ का पता और वहाँ रहने वाले एक कलिग का नम्बर था। हल्की-हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। मुझे मलाड के बारे में जानकारी नहीं थी और मौसम भी अनुकूल नहीं था, इस कारण  मैने टैक्सी लेना ही ठीक समझा। टैक्सी ले कर मैं मलाड की तरफ चल पड़ा। आसमान में बादलो का रंग गहरा होते जा रहा था, और अब मुसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी।

मलाड पहुँचकर मैने वो पता टैक्सी वाले को दिया पर उसे वहाँ तक पहुँचने का रस्ता मालूम नहीं था । हमने पता ढूंढते -ढूंढते रानी सती मार्ग का एक चक्कर लगा लिया। अब मैने मलाड स्थित क्वाटर में अपने कलिग जिनका नम्बर मुझे दिया था उन्हे फोन मिलाया पर कोई रिस्पांस नहीं मिला। मैं लगातार उस नम्बर पर कोशिश करता रहा। टैक्सी वाला मेरे जबाव के इंतजार में मुझे देखे जा रहा था। मैने टैक्सी रोकने का इशारा किया और उसे पैसे दे कर खुद ही पता ढूढने निकल पड़ा। 

मूसलाधार बारिश हो रही थी। लगातार कई घंटे के बारिश के बाद सड़को पर पानी भरने लगा था । मैं एक छोटे से छाते को लगाकर पता ढूंढ़ता रहा ,पर कुछ पता नहीं चल पाया। मैं उपर से नीचे तक भींग चुका था और बैग भी भींग कर भारी हो चुका था। मैं उस कलिग के नम्बर पर फिर से सम्पर्क करने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी देर बाद उस नम्बर से मुझे काँल आया। मैने उन्हें बताया की काफी कोशिश करने के बाद भी मैं वहाँ नही पहुँच पा रहा  हूँ। उन्होनें मेरा लोकेशन पूछा और वहीं रूकने को कहा ।

बारिश लगातार हुए जा रही थी। मुम्बई की बारिश से मेरा पहली बार सामना हो रहा था। आधे घंटे से ज्यादा समय गुजर चुका था। काफी देर इंतजार करने के बाद मेरे कलिग बस स्टैंड पहुँचे जहाँ मैं खड़ा था । मैं उनके पीछे चल पड़ा । वो मुझे पहाड़ी पर स्थित रहेजा के बैंक क्वाटर तक ले गये । वहाँ  पहुँच कर मैने राहत की सांस ली। मैं सोच रहा था कि अब मुझे रहने के लिये कमरा मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे बताया गया कि यहाँ कमरा खाली नहीं है आपको यहाँ से 1-1.5 किलोमीटर दूर बैंक के दूसरे क्वाटर में जाना है।

मैं फिर से निकल पड़ा । वो कलिग अब भी मेरे साथ थे । मूसलाधार बारिश अभी भी हो रही थी , हमे कोई आँटो नहीं मिला । हमलोग पैदल ही चल पड़े । 20-25 मिनट के बाद हम उस क्वाटर तक पहुँचे, तीसरी मंजिल के एक कमरे में मुझे ले जाया गया ।लेकिन यह कमरा भी खाली नहीं था दरसल  जिनका यह फ्लेट है वो बैंक के काम से कहीं बाहर गये हुए थे और कल तक वापस आ जाएगे। मुझे बस आज रात के लिए ये कमरा मिला था।

मैं पूरी तरह से भींग चुका था और ठंड से काँप रहा था। बैग के अंदर के सारे कपड़े भींग कर एक कोने में अंडे की शक्ल बना चुके थे ।मैने कपड़ो को बैग से निकार कर घर में लगे हैंगर से सुखने के लिए टांग दिया। मेरे पास कोई भी सूखा कपड़ा नहीं था। मैने वहाँ रहने वाले भाई साहब का पुराना पड़ा हाँफ पैंट पहन लिया। रात के12 बजने वाले थे। मुझे भूख लगी थी पर शायद रात का खाना आज नसीब नहीं था। मैं बिस्तर पर लेट कर सोना चाहता था ,लेकिन थकावट ने मुझे सोने नहीं दिया। मैं सारी रात करवटे बदलता रहा।

अब सुबह के पाँच बज चुके थे । मैं बिस्तर से उठ कर फ्रेश हुआ और आँफिस  जाने की  तैयारी करने लगा । बाहर अब बारिश थम चुकी थी और मौसम बिल्कुल साफ था। मैं निकल पड़ा एक नये शहर मुम्बई को जानने के लिए, जिससे मुझे अब हर रोज रूबरू होना था……………..।

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