सुबह सुबह मोबाइल में खबर आई है,
बैंको में इस महीने है १५ दिन की छुट्टियां,
निपटा ले अपना काम, नहीं तो होगी मुश्किल |
मै सुबह की चाय की प्याली के साथ,
छुट्टियां कहाँ बिताऊ ये सोचने लगा,
परिवार के साथ मसूरी जाऊं,
या दोस्तों के साथ कही और,
घर पर बोर तो नहीं होऊंगा |
अपने मैनेजर को फ़ोन मिलाया,
छुट्टियों के बारे में बताया और,
एडवांस की फरमाइश कर दी,
लेकिन रकम देने की बजाये,
उन्होंने कई सवाल दाग डाले,
क्या मैनेजर को छुट्टियां नहीं चाहिए,
या अलगाव हो गया है छुट्टियों से,
छुट्टियों में काम करते करते,
ऑफिस में मिलते है, कहकर फ़ोन रख दिया |
भागकर ऑफिस पहुंचा, मसूरी का सोचते सोचते,
मैनेजर ने केबिन में बुलाया, चाय पिलाया,
एक के बाद एक काम का ब्यौरा लिया,
बोले सब तो ठीक है, अब ये बताओ,
रात को खाने में क्या खाया था,
वही रोटी सब्जी और दूध,
तो फिर गड़बड़ कहाँ हुई,
आपकी यादाश्त कहाँ गुम है,
शक तो मुझे भी हो रहा है मैनेजर की बात सुनकर,
लेकिन मैनेजर पर जिन्हे छुट्टियां आने पर ख़ुशी नहीं होती |
छुट्टियों का सर्कुलर मंगाया साहब ने,
टेबल पर रख, छुट्टियों के दिन गिनाये,
महीने में वही “दो दिन” शनिवार रविवार छोड़कर,
बैंक में होने के नाते मुझे सर्कुलर का मतलब पता है |
सुबह की खुमारी अब गायब हो चुकी थी,
लेकिन सवाल था, मोबाइली अख़बार का क्या,
भारत एक बड़ा देश है, हरेक राज्य की छुट्टियां अलग अलग,
हर जगह की छुट्टियों को मिलाएं, तो भी इतना नहीं होता,
मुझे गणित छोड़े कई बरस हो गए है,
अब इनका गणित तो किसी मीडिया पर्सन से लेना होगा,
झल्लाया हुआ मैंने कइयों को मेल किया,महीना गुजरने को है,
अब भी जबाब का इंतज़ार है |
