गाँधी। ये ऐसा नाम है जिसे हर भारतीय ने सुना है, पढ़ा है। हमारी टेक्स्टबुक की किताबें हमेशा गाँधी को महात्मा या बापू कहकर सम्बोधित करती है। हमने भी इसे ही सच माना है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य ने हमें ये सोचने पर मजबूर किया है कि क्या गाँधी सचमुच में महात्मा थे? क्या हिन्दुवाद और गांधीवाद विरोधी है? क्या गांधीवाद के पतन के बाद ही हिन्दुवाद आगे बढ़ पायेगा? आइये इस गाँधी जयंती हम महात्मा से रूबरू होते है।

“जब मैं निराश होता हूं तब मैं याद करता हूं कि हालांकि इतिहास सत्य का मार्ग होता है किंतु प्रेम इसे सदैव जीत लेता है। यहां अत्याचारी और हतयारे भी हुए हैं और कुछ समय के लिए वे अपराजय लगते थे किंतु अंत में उनका पतन ही होता है -इसका सदैव विचार करें।”
मोहनदास करमचंद गाँधी जिन्हे हम सब बापू के नाम से जानते है। इनका जन्म गुजरात के पोरबंदर में २ अक्टूबर १८६९ को हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी एवं माता का नाम पुतलीबाई था।करमचन्द गान्धी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान अर्थात् प्रधान मन्त्री थे। पुतलीबाई की देखरेख और उस क्षेत्र की जैन परम्पराओं के कारण युवा मोहनदास पर वे प्रभाव प्रारम्भ में ही पड़ गये थे जिसने आगे चलकर महात्मा गांधी के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इन प्रभावों में सम्मिलित थे दुर्बलों में उत्साह की भावना, शाकाहारी जीवन, आत्मशुद्धि के लिये उपवास तथा विभिन्न जातियों के लोगों के बीच सहिष्णुता।
१३ वर्ष की आयु पूर्ण करते ही उनका विवाह कस्तूर बाई मकनजी से कर दिया गया। पोरबंदर से उन्होंने मिडिल और राजकोट से हाई स्कूल किया। दोनों परीक्षाओं में वह एक साधारण छात्र रहे।मैट्रिक के बाद की परीक्षा उन्होंने भावनगर के शामलदास कॉलेज से उत्तीर्ण की।अपने १९वें जन्मदिन से लगभग एक महीने पहले गांधी यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये।
गाँधी ने वकालत का सफर बम्बई से शुरू किया लेकिन उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। बाद में उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने के लिये राजकोट को ही अपना स्थायी मुकाम बना लिया। उन्होंने सन् १८९३ में एक भारतीय फर्म से नेटाल दक्षिण अफ्रीका में, जो उन दिनों ब्रिटिश साम्राज्य का भाग होता था, एक वर्ष के करार पर वकालत का कारोवार स्वीकार कर लिया।
दक्षिण अफ्रीका (1893-1914) में नागरिक अधिकारों के आन्दोलन
गांधी दक्षिण अफ्रीका में (1895)
दक्षिण अफ्रीका में गान्धी को भारतीयों पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। आरम्भ में उन्हें प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के लिए ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था। इतना ही नहीं पायदान पर शेष यात्रा करते हुए एक यूरोपियन यात्री के अन्दर आने पर चालक की मार भी झेलनी पड़ी। उन्होंने अपनी इस यात्रा में अन्य भी कई कठिनाइयों का सामना किया। अफ्रीका में कई होटलों को उनके लिए वर्जित कर दिया गया। इसी तरह ही बहुत सी घटनाओं में से एक यह भी थी जिसमें अदालत के न्यायाधीश ने उन्हें अपनी पगड़ी उतारने का आदेश दिया था जिसे उन्होंने नहीं माना। ये सारी घटनाएँ गान्धी के जीवन में एक मोड़ बन गईं और विद्यमान सामाजिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं तथा सामाजिक सक्रियता की व्याख्या करने में मददगार सिद्ध हुईं। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए गान्धी ने अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत अपने देशवासियों के सम्मान तथा देश में स्वयं अपनी स्थिति के लिए प्रश्न उठाये।
“एक आंख के लिए दूसरी आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।”
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए संघर्ष (१९१६ -१९४५)
गांधी १९१५ में दक्षिण अफ्रीका से भारत में रहने के लिए लौट आए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों पर अपने विचार व्यक्त किए। गांधी जी को पहली बड़ी उपलब्धि १९१८ में चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह में मिली।
चंपारण का किसान आंदोलन अप्रैल 1917 में हुआ था। किसानों को जबरदस्ती अपनी भूमि के 15% हिस्से पर नील की खेती करनी होती थी। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह और अहिंसा के अपने आजमाए हुए अस्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण की धरती पर ही किया। गाँधी जी को इसमें सफलता भी मिली। यहीं उन्होंने यह भी तय किया कि वे आगे से केवल एक कपड़े पर ही गुजर-बसर करेंगे। इसी आंदोलन के बाद उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से विभूषित किया गया।
गुजरात का खेड़ा गाँधी का अगला पड़ाव था। उस साल खेड़ा जिले में फसलें नष्ट हो गयी थी फिर भी उनसे कर वसूली की जा रही थी। अधिकारी किसी की सुनने को तैयार नहीं थे। खेड़ा के किसान भारी संकट में थे। गाँधी जी ने वहां किसानो को सत्याग्रह करने की सलाह दी। और गांव वालों को सत्याग्रह का अर्थ समझाते हुए कहा- ‘सत्य की खातिर आग्रह पूर्वक ना कहना ही सत्याग्रह है।’ गांधी जी ने असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ़ शस्त्र के रूप में उपयोग किया।
“मरने के लिए मैरे पास बहुत से कारण है किंतु मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है “
पंजाब में अंग्रेजी फोजों द्वारा भारतीयों पर जलियावांला नरसंहार ने देश को भारी आघात पहुँचाया, जिससे जनता में क्रोध और हिंसा की ज्वाला भड़क उठी। गाँधी जी ने शिकार लोगो के प्रति संवेदना व्यक्त किया और अंग्रेजों की कड़ी निंदा की।
दिसम्बर १९२१ में गांधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस को स्वराज के नाम वाले एक नए उद्देश्य के साथ संगठित किया गया। गांधी जी ने अपने अहिंसात्मक मंच को स्वदेशी नीति — में शामिल करने के लिए विस्तार किया जिसमें विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। इससे जुड़ने वाली उनकी वकालत का कहना था कि सभी भारतीय अंग्रेजों द्वारा बनाए वस्त्रों की अपेक्षा हमारे अपने लोगों द्वारा हाथ से बनाई गई खादी पहनें। इसके अलावा गांधी जी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थाओं तथा अदालतों का बहिष्कार और सरकारी नौकरियों को छोड़ने का तथा सरकार से प्राप्त तमगों और सम्मान को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया।
असहयोग आंदोलन को दूर-दूर से अपील और सफलता मिली जिससे समाज के सभी वर्गों की जनता में जोश और भागीदारी बढ गई। फिर जैसे ही यह आंदोलन अपने शीर्ष पर पहुँचा वैसे फरवरी १९२२ में इसका अंत चौरी-चोरा, उत्तरप्रदेश में भयानक द्वेष के रूप में अंत हुआ। इस अहिंसक घटना के बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। गाँधी जी पर राष्ट्रद्रोह का मुक़दमा चलाया गया और उन्हें ६ साल की सजा सुनाई गयी। लेकिन उन्हें दो साल की जेल के बाद रिहा कर दिया गया।

अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक नया सवैधानिक सुधार आयोग बनाया जिसमें एक भी सदस्य भारतीय नहीं था। सभी भारतीय राजनैतिक दलों ने इसका घोर विरोध किया। दिसम्बर १९२८ में गांधी जी ने कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के एक अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें भारतीय को साम्राज्य की सत्ता प्रदान करने के लिए कहा गया था अथवा ऐसा न करने पर संपूर्ण देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन छेड़ने के लिए सहमति दी। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने इन मांगो पर कोई ध्यान नहीं दिया।
२६ जनवरी १९३० का दिन लाहौर में भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मनाया। यह दिन लगभग प्रत्येक भारतीय संगठनों द्वारा भी मनाया गया। इसके बाद गांधी जी ने मार्च १९३० में नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नया सत्याग्रह चलाया जो १२ मार्च से ६ अप्रेल तक चला। इसमें ४०० किलोमीटर का सफर अहमदाबाद से दांडी, गुजरात तक चलाया गया ताकि स्वयं नमक उत्पन्न किया जा सके। समुद्र की ओर इस यात्रा में हजारों की संख्या में भारतीयों ने भाग लिया। भारत में अंग्रेजों की पकड़ को विचलित करने वाला यह एक सर्वाधिक सफल आंदोलन था जिसमें अंग्रेजों ने ८०,००० से अधिक लोगों को जेल भेजा।
लार्ड एडवर्ड इरविन द्वारा प्रतिनिधित्व वाली सरकार ने गांधी जी के साथ विचार विमर्श करने का निर्णय लिया। इरविन गांधी की सन्धि मार्च १९३१ में हस्ताक्षर किए गए थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन को बंद करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सभी राजनैतिक कैदियों को रिहा करने के लिए अपनी रजामन्दी दे दी। इस समझौते के परिणामस्वरूप गांधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन में आयोजित होने वाले गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया गया। यह सम्मेलन गांधी जी और राष्ट्रीयवादी लोगों के लिए घोर निराशाजनक रहा, इसका कारण सत्ता का हस्तांतरण करने की बजाय भारतीय कीमतों एवं भारतीय अल्पसंख्यकों पर केन्द्रित होना था। इसके अलावा, लार्ड इरविन के उत्तराधिकारी लार्ड विलिंगटन, ने राष्ट्रवादियों के आंदोलन को नियंत्रित एवं कुचलने का एक नया अभियान आरम्भ कर दिया। गांधी फिर से गिरफ्तार कर लिए गए।
” मृतकों, अनाथ तथा बेघरों के लिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पवित्र नाम के नीचे संपूर्णवाद का पागल विनाश छिपा है।”
द्वितीय विश्व युद्ध १९३९ में जब छिड़ा तो नाजी जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया।अंग्रेजी सेना भी इस युद्ध में मित्र देश की तरफ से शामिल थी। कांग्रेस के नेताओं ने भारत को युद्ध में जनता के प्रतिनिधियों के परामर्श लिए बिना इसमें एकतरफा शामिल किए जाने का विरोध किया। कांग्रेस के सभी चयनित सदस्यों ने सामूहिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लंबी चर्चा के बाद, गांधी ने घोषणा की कि जब स्वयं भारत को आजादी से इंकार किया गया हो तब लोकतांत्रिक आजादी के लिए बाहर से लड़ने पर भारत किसी भी युद्ध के लिए पार्टी नहीं बनेगी। जैसे जैसे युद्ध बढता गया गांधी जी ने आजादी के लिए अपनी मांग को अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन नाम देकर तीव्र कर दिया। यह गांधी तथा कांग्रेस पार्टी का सर्वाधिक स्पष्ट विद्रोह था जो भारत देश से अंग्रेजों को खदेड़ने पर लक्षित था।
“भारत छोड़ो”इस संघर्ष का सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन बन गया जिसमें व्यापक हिंसा और गिरफ्तारी हुई। पुलिस की गोलियों से हजारों की संख्या में स्वतंत्रता सेनानी या तो मारे गए या घायल हो गए और हजारों गिरफ्तार कर लिए गए। गांधी और उनके समर्थकों ने स्पष्ट कर दिया कि वह युद्ध के प्रयासों का समर्थन तब तक नहीं देंगे तब तक भारत को तत्काल आजादी न दे दी जाए। उन्होंने सभी कांग्रेसियों और भारतीयों को अहिंसा के साथ “करो या मरो” के द्वारा अन्तिम स्वतन्त्रता के लिए अनुशासन बनाए रखने को कहा।
हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन को अपने उद्देश्य में आशिंक सफलता ही मिली लेकिन आंदोलन के निष्ठुर दमन ने १९४३ के अंत तक भारत को संगठित कर दिया। विश्व युद्ध के अंत में, ब्रिटिश ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि संत्ता का हस्तांतरण कर उसे भारतीयों के हाथ में सौप दिया जाएगा। इस समय गांधी जी ने आंदोलन को बंद कर दिया जिससे कांग्रेसी नेताओं सहित लगभग १००,००० राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया।

गांधी जी किसी भी ऐसी योजना के खिलाफ थे जो भारत को दो अलग अलग देशों में विभाजित कर दे। भारत में रहने वाले बहुत से हिंदुओं, सिक्खों एवं मुस्लिमों का भारी बहुमत देश के बंटवारे के पक्ष में था। व्यापक स्तर पर फैलने वाले हिंदु मुस्लिम लड़ाई को रोकने के लिए ही कांग्रेस नेताओं ने बंटवारे की इस योजना को अपनी मंजूरी दे दी थी। गांधी जी के करीबी सहयोगियों ने बंटवारे को एक सर्वोत्तम उपाय के रूप में स्वीकार किया और सरदार पटेल ने गांधी जी को समझाने का प्रयास किया कि नागरिक अशांति वाले युद्ध को रोकने का यही एक उपाय है। मज़बूर गांधी ने अपनी अनुमति दे दी।
सैद्धांतिक रूप से दो राष्ट्र भारत और पाकिस्तान बनाने की बात कही गयी। पाकिस्तान को क्षतिपूर्ति के तौर पर ५५ करोड़ देने की भी बात हुई। लेकिन बाद में भारत की सरकार ५५ करोड़ देने से मुकर गई। सरदार पटेल को लगता था कि पाकिस्तान इस पैसे का इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए कर सकता है। गाँधी जी सरकार पर हिन्दू मुस्लिम बातचीत जारी रखने एवं पाकिस्तान को ५५ करोड़ क्षति पूर्ति देने के लिए अनशन पर बैठ गए। गांधी जी को डर था कि पाकिस्तान में अस्थिरता और असुरक्षा से भारत के प्रति उनका गुस्सा और बढ़ जाएगा तथा सीमा पर हिंसा फैल जाएगी। अंत में सरकार को पाकिस्तान को भुगतान करना पड़ा।
३० जनवरी, १९४८, गांधी की उस समय नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वे नई दिल्ली के बिड़ला भवन के मैदान में रात में चहलकदमी कर रहे थे। गांधी का हत्यारा नाथूराम गौड़से हिन्दू राष्ट्रवादी थे जिनके कट्टरपंथी हिंदु महासभा के साथ संबंध थे जिसने गांधी जी को पाकिस्तान को भुगतान करने के मुद्दे को लेकर भारत को कमजोर बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। राज घाट, नई दिल्ली, में गांधी जी के स्मारक पर “हे राम ” लिखा हुआ है। ऐसा व्यापक तौर पर माना जाता है कि जब गांधी जी को गोली मारी गई तब उनके मुख से निकलने वाले ये अंतिम शब्द थे।
आइये आज बापू को उनके सबसे प्रिय भजन के द्वारा नमन करते है।

**इस आर्टिकल के लिए सामग्री विकिपीडिया से ली गयी है। इसके लिए हम उनका आभार व्यक्त करते है।
