टोपी ले लो, हरी-नीली-पीली टोपी ले लो

सुबह होते ही फेरीवाला टोपियों की थैली लेकर निकल चूका है. गांव के हर गली चौराहे पर जाकर वो रुकता है और जोर से सिटी जैसी आवाज़ लगाते हुए चिल्लाता है, “टोपी ले लो, हरी-नीली-पीली टोपी ले लो”. बच्चो की टोलियां उसके आगे पीछे घूम रही है. कई बच्चे सुन्दर टोपियां खरीदने के लिए उतावले है. पहले तो माता पिता टोपी के लिए मना करते है, लेकिन फेरीवाला एक सुन्दर सी टोपी उनके लडके के सिर पर बिना कुछ पूछे रख देता है.

टोपी लडके के सिर पर खूब शोभ रहा है. लड़का भी टोपी पहन राजा जैसा अभिनय करने लगता है. माता पिता खुद को रोक नहीं पाते है. अपने बच्चे के लिए एक टोपी खरीद लेते है. ये सिलसिला सुबह से दोपहर तक चलता रहता है. बच्चें उनसे टोपियां खरीदते जा रहे है. 


दोपहर का सूरज सर पर आ गया है. फेरीवाले को भी थोड़ी थकान महसूस हो रही है. बच्चों की टोलियां भी अब गायब हो चुकी है. फेरीवाला गांव से बाहर आ गया है. एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे अपनी थैली रखता है और वही बैठ जाता है. एक पोटली निकलता है और उससे चना चबेना निकालकर खाने लगता है. खाने के बाद वही पास में लगे चापाकल से पानी पीता है.

बरगद के पेड़ के नीचे ही अपना गमछा बिछाता है और लेट जाता है. बरगद की छावं इस गर्म दोपहरिया में सुहावनी लग रही है. लेटते ही उसकी आँख लग जाती है और वो सो जाता है. 


पेड़ों पर बैठे बंदरों के तेज आवाज़ करते हुए लड़ने के कारण फेरीवाले की नींद खुल जाती है. वह हड़बड़ाकर उठ बैठता है. वह देखता है, उसकी टोपियां थैली के बाहर बिखरी पड़ी है. वह तुरंत उन्हें जमा करता है और थैली के अंदर डालता है. अभी भी कुछ टोपी गायब है. वह नजरें उठाकर बरगद के ऊपरी तने की और देखता है. वह देखकर दंग रह जाता है. वहां पेड़ के ऊपर दो बंदरों का जोड़ा बैठा है. उन्होंने टोपी को किसी बच्चे की तरह सिर पे लगाया हुआ है. कुछ टोपी हाथो में भी ले रखा है. 


फेरीवाले एक पत्थर जमीन से उठता है और बंदरों को डराने की कोशिश करता है. लेकिन बन्दर चुपचाप बैठे रहते है और फेरीवाले को घूरने लगते है. फेरीवाला कई पत्थर के टुकड़े बंदरों की ओर फेकता है. अब तो बन्दर जैसे नाराज हो जाते है. उन्ही पत्थरों को लपककर फेरीवाले पर हमला कर देते है. एक बन्दर तो पेड़ की सूखी टहनियां तोड़कर फेरीवाले की ओर फेंकने लगता है. फेरीवाला डरकर थोड़ा पीछे हट जाता है.

वह कुछ सोचता है और अपने थैले से कुछ केले निकलता है और उसे पेड़ की नीचे डाल देता है. केले बंदरों को बहुत पसंद है. वह केले का लालच बंदरों को दे रहा है ताकि बन्दर नीचे आएं और उसकी टोपियां वापस करें. दोनों बन्दर शांति से डाली पर बैठे रहते है. एकाएक एक बन्दर तेजी से नीचे उतरता है, केला हाथ में पकड़ता है और उसी तेजी से वापस पेड़ पर चढ़ जाता है. फेरीवाला उसे छू भी नहीं पाता है.

बन्दर पहले ही टोपी पहनकर बैठे थे और अब केले भी ले गए. बन्दर केले छील छील कर खाने लगते है. फेरीवाले को बहुत गुस्सा आता है, वह अपना पैर जमीन पर पटकता है और अपने सिर पे रखी टोपी भी जमीन पर निकाल कर फेक देता है. बन्दर भी इसबार उसकी नक़ल करते है और सारी टोपियां नीचे फेक देतें है. फेरीवाला तुरंत उन्हें समेटता है, थैली में डालता है और तेजी से वहां से निकल जाता है. 


वह गाँव के अंदर वापस आ चूका है. सूरज भी अब ढलान की ओर है. धुप अब कम चूका है. फेरीवाला जोर से चिल्लाता है “टोपी ले लो हरी-नीली-पीली टोपी ले लो”.

** साभार : दादा जी की जुबानी सुनी कहानियां. उपरोक्त पिक्चर गूगल फोटो से ली गयी है, जो सिर्फ कहानी को दर्शाने के लिए है।

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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