भारत में बैंकिंग क्षेत्र

बैंकिंग वर्त्तमान की आवश्यकता है। इस समय ऐसे व्यवसाय और वित्तीय प्रणाली के बारे में सोचना जिसमे बैंकिंग ना हो असंभव सा है। भारत में बैंकिंग व्यवस्था बहुत पुरानी है। इस व्यवस्था में महाजन और साहूकार लोग आते है, जो जरूरतमंदों को ऋण मुहैया कराते थे। गणना की कोई सटीक विधि नहीं थी जिसका फायदा ये उठाते थे और अपने ग्राहक से मनमाना व्याज वसूल करते थे। इनके जाल में एक बार फसने के बाद निकल पाना बहुत ही मुश्किल था। लेकिन तब कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने के कारण साहूकारिता और महाजनी बेरोक टोक फलती फूलती रही।

भारतीय बैंकिंग का इतिहास

वर्तमान बैंकिंग व्यवस्था की शुरुआत अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में हुई। सबसे पहले स्थापित होने वाले बैंको में बैंक ऑफ़ हिंदुस्तान (१७७०), जनरल बैंक ऑफ़ इंडिया (१७८६), बैंक ऑफ़ कलकत्ता (१८०६) इत्यादि शामिल है। लेकिन आज़ादी के पहले तक ये समाज के कुछ उच्च वर्गों तक ही सिमित थे। स्वतंत्रता के बाद व्यावसायिक बैंको को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए भारत की सरकार ने साल १९६९ में १४ बड़े बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया।  ६ और भी बैंको का साल १९८० में राष्ट्रीयकरण हुआ। अब इन बैंको का उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना था। इनके मुख्य लक्ष्य थे –

(१) धन को एक बड़े समुदाय से एकत्रित करना या बचत के रूप में स्वीकार करना।

(२) समाज के पिछड़े तबके एवं पिछड़े क्षेत्रों को बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराना।

(३) बैंकिंग वित् को उत्पादक कार्यो में लगाना जबकि इसे गैर उत्पादक कार्यो एवं सट्टेबाजी से अलग रखना।

साल १९६९ में जहाँ ८२६२ बैंक ब्रांचेज थे, वहीँ १९९२ में ये आंकड़ा बढ़कर ६०००० के पार पहुँच गया। इनमे से बड़ी संख्या में ब्रांचेज ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए। साल १९९१ में उदारीकरण की शुरुआत हुई एवं नरसिम्हन समिति की रिपोर्ट आने के बाद बैंकिंग क्षेत्र को नए लोगो के लिए खोल दिया गया। कई नए प्राइवेट बैंक स्थापित हुए जिसमे HDFC (१९९४) एवं ICICI बैंक (१९९४) प्रमुख है।

बैंको के कार्य :

लोग बहुत से कार्यो के लिए बैंको पर निर्भर करते है। इनके आर्थिक विकास एवं रोज की दिनचर्या में बैंक भी शामिल हो चुके है। बैंको के इस महत्व के पीछे निम्न कारण है –

१. धन के लिए सुरक्षा प्रदान करना – आज के भाग दौड़ भरी जिंदगी में घर में धन को रखना सुरक्षित नहीं होता। ऐसे में बैंक एक अच्छा विकल्प है।

२. बचत की आदत बनाना – बैंको में बहुत सारी लाभकारी स्कीम चलाई जाती है। जिसमे निवेश आपको आर्थिक तरक्की एवं समय पर धन उपलब्ध करता है।

३. व्यापर एवं रोजगार को बढ़ावा देना -बहुत सारे व्यापारिक कार्यो के लिए बैंक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है एवं रोजगार के नए अवसर सृजित होते है।

४. कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना – कृषि क्षेत्र में प्रत्यक्ष एवं अप्रयत्क्ष कृषि में बैंको द्वारा कई स्कीम चलाई जा रही है। जिससे कृषकों एवं कृषि से जुड़े व्यापापारियों को समय पर धन उपलब्ध हो पाता है।

५. औद्योगिक क्षेत्रो का विकास – बैंको द्वारा लघु, सूक्ष्म एवं मझोले उद्योगों को कई तरह के वित्तीय ऋण उपलब्ध कराया जाता है। जिससे इन क्षेत्रों का विकास हुआ है। एवं रोजगार के नए अवसर खुले है।

६. रकम के आदान-प्रदान के लिए कई नई व्यवस्था को अपनाना – NEFT, RTGS, IMPS जैसे कई प्रचलित व्यवस्था के साथ साथ UPI, SCAN & PAY, AEPS जैसी नई व्यवस्था ने बैंकिंग क्षेत्र में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया है।

भारतीय बैंकिंग को प्रभावित करने वाले कारक

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के विकास ने औद्योगिक विकास एवं नए रोजगार सृजन में सकारात्मक भूमिका निभाई है। फिर भी कुछ नकारात्मक बातें बैंको के विकास के आड़े आ रही है। जिसने बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित किया है।१. निम्न लाभप्रदता – बैंक ऋण में अनियमितता, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी एवं बैंकिंग कार्यो में लागत बढ़ने से बैंको की आय कम हुई है।

२. NPA में बढ़ोतरी – बैंको के गैर निस्पादनीय परिसम्पतियों में वृद्धि हुई है। जिससे बैंको का मुनाफा कम हुआ है एवं ऋणों के लिए पूंजी की उपलब्धता में कमी आयी है।

३. बैंको की बीमारू स्थिति – भारत में कई बैंक बीमारू स्थिति में पहुँच चुके है। जिसके कारण कई बैंको का दूसरी बैंको में विलय कर दिया गया है।

४. बैलेंस शीट में विंडो ड्रेसिंग – कई कंपनियां अपने बैलेंस शीट में विंडो ड्रेसिंग करती है।  खासकर कर के तिमाही एवं वार्षिक समापन के समय और बैलेंस शीट में आकड़े बढाकर शेयर होल्डर को दिखाए एवं पब्लिश किये जाते है।

५. दोहरा नियंत्रण – भारतीय बैंकिंग क्षेत्र सरकार एवं रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के दोहरे नियंत्रण के कारण नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए हैं।

६. सट्टेबाजी – शेयर के खरीद फरोख्त में होने वाली सट्टेबाजी में कई बैंको की संलिप्तता ने बैंकिंग साख को बट्टा लगाया है। इससे इनकी छवि एवं लाभप्रदता को नुकसान हुआ है।

बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के उपाय

नरसिम्हन समिति ने बैंको की स्थिति में सुधार के लिए कई सुझाव दिए है –

१. भारत में ३ से ४ बड़े बैंको का निर्माण जो विश्वस्तरीय हो।

२. ८ से १० राष्ट्रीय बैंक जिनकी पहुँच पुरे भारत में हो। एवं जो यूनिवर्सल बैंकिंग सेवाएं प्रदान करे।

३. RRBs को हर तरह की बैंकिंग गतिविधियों की इजाजत दी जाये।

४. शाखा खोलने की लाइसेंसिंग प्रक्रिया बंद हो एवं इसे पूरी तरह बैंको के विवेक एवं शाखा की लाभप्रदता पर छोड़ दिया जाये।

५. विदेशी बैंको को भारत में शाखा खोलने की इजाजत मिले एवं भारतीय बैंको के समान ही नियमावली इनके लिए लागु हो।

६. बैंको में कम्प्यूटराइजेशन को बढ़ावा दिया जाये।

७. हरेक बैंक को अपने अधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया को अपने अनुसार कराने की स्वतंत्रता हो।

८. भारत में बैंको का दोहरा नियंत्रण खत्म हो। एवं वित्त मंत्रालय के अधीन बैंकिंग डिवीज़न को बंद किया जाये।

९. भारत में बैंको के सुपरवाइसरी के लिए एक अर्धनियामक एवं स्वतंत्र संस्था हो जो RBI के तहत काम करे।

१०. बैंको के सीईओ एवं सीओ पोस्ट के लिए चयन में राजनैतिक हस्तक्षेप खत्म हो एवं चयन प्रक्रिया पूरी तरह व्यावसायिक हो।

११. सभी बैंको में एकाउंटिंग के लिए समान व्यवस्था लागु की जाये एवं बैलेंस शीट के निर्माण में पूरी पारदर्शिता रखी जाये।

१२. तेजी से बैंक ऋण के रिकवरी के लिए एक ट्रिब्यूनल बनाया जाये।

उपरोक्त सुझावों के अलावा कई अन्य सुझाव भी नरसिम्हन समिति ने दिए। जिसमे से सरकार कई सुझावों को लागु कर चुकी है एवं कई सुझावों पर कार्य कर रही है। आने वाले वक़्त में बैंकिंग व्यवस्था में सुधार होगा एवं बैंको के विकास के खुले अवसर उपलब्ध होंगे।

वर्तमान में भारत में बैंकिंग क्षेत्र

भारत में अभी १२ पब्लिक सेक्टर बैंक्स, २२ प्राइवेट सेक्टर बैंक्स, ४६ फॉरेन बैंक्स, ५६ रीजनल रूरल बैंक्स, १४८५ अर्बन कोआपरेटिव बैंक्स, एवं ९६००० रूरल कोआपरेटिव (कोआपरेटिव क्रेडिट इंस्टीटूशन सहित ) हैं। सितम्बर २०२१ के आकड़ो के अनुसार कुल एटीएम की संख्या २१३१४५ तक पहुँच चुकी है। जिसमे से ४७.५% ग्रामीण एवं अर्ध शहरी क्षेत्रों में है। FY18-FY21 तक बैंको की पूंजी में वृद्धि हुई है। सभी बैंको की एकत्रित ऋण पूंजी FY21 के अंत तक US$ 1.56 ट्रिलियन के पार पहुँच गयी है जबकि बैंको की जमा पूंजी २०२१ के अंत तक US$ 2.17 ट्रिलियन है।

सरकार के द्वारा उठाये गए कदम

१. नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी १५ NPA एकाउंट्स को अधिग्रहित करेगी जिसका कुल मूल्य ५०००० करोड़ रूपए है।

२.नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने UPI LITE लाने की घोषणा की है। जिसमे डिजिटल पेमेंट के लिए UPI ऑफलाइन सर्विस का इस्तेमाल होगा।

३. यूनियन बजट २०२२-२३ के घोषणा के अनुसार, भारत में सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) शुरू की जाएगी। जो सम्भवता इ-रूपी कहलायेगा।

४. नवंबर २०२१ में RBI ने RBI DIRECT स्कीम शुरू किया है जिसके द्वारा खुदरा निवेशक गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में निवेश कर पाएंगे।

५. अगस्त २०२१ में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इ-रूपी शुरू किया है जो एक PERSONAL & PURPOSE SPECIFIC डिजिटल पेमेंट सलूशन है।

६. यूनियन बजट २०२१-२२ के अनुसार , सरकार IDBI में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश करेगी एवं दो सरकारी बैंको को प्राइवेट बैंक में तब्दील करेगी।

निष्कर्ष

आधारभूत संरचनाओं में निवेश में वृद्धि , परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी, सुधारो के जारी रहने के कारण बैंकिंग क्षेत्र में तेजी रहने की उम्मीद है। उद्योग धंधो में तेजी ऋण की मांग बढ़ा रही है जिससे बैंक ऋण में वृद्धि होने की पूर्ण सम्भावना है।

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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