धड़कते हुए इस दिल से मैंने पूछा कि क्या है तेरी ख्वाहिश,
ऊपर वाले ने कुछ लिखा था तुम्हारी किस्मत मे,
क्या तू समझ पाया है उनकी मंशा, मुझे बता
कुछ तो है जो उनके और मेरे बीच रह गया है, फासला।
शायद वक्त की कमी थी या था हर तरफ थी भीड़।
किस्मत की लकीरों में कुछ भी ना मिल पाया मुझे।
कोरा था कागज, कोशिश है खुद लिखूं अपनी किस्मत
क्या हाथों की लकीरों को मैं कोरे कागज पर उकेर पाऊंगा?
यहाँ तो अपनों ने दिए हैं गम, गैरों से क्या उम्मीद करें,
शायद मंजिलों तक का सफर मुझे अकेले तय करना है,
क्या मिल पाएगा? कहाँ तक मैं जा पाऊँगा?
क्या मै सचमुच कोरा कागज पर लिख पाउँगा,
क्या मुझमें इतनी हिम्मत है कि मैं अपनी किस्मत में कुछ जोड़ पाऊं?
सुन उपरवाले, तूने भले ही हाथो की लकीरों में देरी की हो,
मैं अपनी पसंद की लकीरें जोड़ूंगा भी और अपनी किस्मत लिखूंगा भी ।
