नन्हा हूँ मैं, बिलकुल कोरा हूँ मैं,
ककहरा की किताबें लेकर आई है माँ,
रंगबिरंगे तस्वीरों से भरी है किताबें,
मेरा मन नहीं लगता है इनमे,
लेकिन माँ ने एक उपाय निकाला है,
खाने के साथ किताब की घुट्टी पिला रही है।
स्कूल में हूँ, थोड़ा सयाना हो गया हूँ मैं,
लाइब्रेरी की किताबें लगती है पुरानी,
कॉमिक्स की कहानियां भांति है मुझे,
होंसलो की कमी है, लेकिन पैरों में पंख लगे हैं,
अच्छा बनना हैं, जिंदगी में कुछ करना हैं,
किताबें, प्रेरणाओं से हमें सीखा रही हैं।
कॉलेज में आया हूँ, संग ख्वाहिशें लाया हूँ,
टेक्नोलॉजी से लेकर इतिहास की किताबें,
जाने क्यों लगती हैं फ़साना,
गर तुम्हे कुछ पाना, तो इनसे होगा पार पाना,
किताबें, पढोगे तो सफलता की सीढियाँ चढ़ोगे कह रही हैं।
जब से होश संभाला हैं, तब से हुआ हैं सामना,
आखिर क्यों पढ़ते हम किताबें, क्या हैं इसके मायने,
क्यों कुछ हमलावरों ने नालंदा को था जलाया,
क्यों अकबर के दरबार में नवरत्नों ने जगह था पाया।
हमने जितना खुद को समाज से पाया हैं,
उससे ज्यादा ही किताबों से सीखा है,
सच कहता हूँ, हमारी आँखे हैं ये किताबें,
हमें सोच और नजरिया देती हैं ये किताबें,
हमारे ज्ञान को संजोती हैं ये किताबें,
उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं ये किताबें।
