छुट्टियों के चार दिन

सरपट भाग रही थी जिंदगी,कुछ ऑफिस के भागमभाग में,

कुछ घर के कामो में गुजर रही थी जिंदगी, 

मै एका ही था यहाँ सरकारी नौकरी के साथ,

ना खुद के लिए , ना परिवार के लिए समय.

 
अब तो आधा बरस गुजरने को आया,

माँ ने कहलवाया आ जा घर, देखे बहुत दिन हुए,

पत्नी ने भी प्यार से मिलने को बुलाया,

बच्चों ने भी कहा, पापा आ जाओ.


दस दिन की छुट्टी लेकर निकल पड़ा हूँ,ट्रेन का सफर है,

रास्ता है लम्बा, माँ के चश्मे हो गए है पुराने, उसे है बदलवाना, 

पत्नी के लिए नई साड़ियां भी है लेना,बच्चो के खिलोने भी है खरीदने, 

साथ में गांव के हर से मिल आऊंगा,खेतों के पुराने हिसाब भी कर आऊंगा. 


तीसरे दिन घर में हूँ, पत्नी खाना तो, माँ घर की सफाई में लगी है, 

बच्चे भी अठखेलियां कर रहे है, माँ ने देखते ही कहा, तू दुबला हो गया है, 

चल तेरे लिए आज मनपसंद पकवान बनाती हूँ

,मैंने सोचा चलो गाँव में सबसे मिल आता हूँ, 

घरो के साथ लोग कितने बदले है, ये समझ आता हूँ.


 शाम ढल चुकी है, पत्नी ने है बिस्तर लगाया, 

शायद उन्हें सारी बात मुझे आज बताना है, 

गुड़िया की मम्मी और सोनू सावजी की कहानी सुनाना है, 

फ़ोन के मिनट के थे चार्जेज आज पूरी आजादी है. 


घर में बच्चों के साथ बच्चों वाली हरकत करना, 

खाना खाने के बाद आराम से दोपहर की झपकी लेना, 

पत्नी से प्यार भरी बातें और नोक झोक करना, 

शाम को चौपाल में गाँव वालों के साथ गप्पे लड़ाना, 

जिंदगी अब असली रंग में है, हर तरफ प्यार ही प्यार है.


 सुबह सुबह घड़ी के अलार्म ने जगाया है,

आज दस बजे की ट्रेन है, वापस लौट जाना है, 

हाय सरकारी नौकरी, तू क्या फ़साना है, 

सबका प्यार दुलार छोड़ फिर से ऑफिस को आना है.

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