गरुआ के घने जंगल के किनारे बसंतपुरा गांव था। गाँव पर हमेशा लुटेरों का भय बना रहता था। एक अँधेरी रात जब सब गहरी नींद में सो रहे थे, लुटेरे आये और “सोना” के घर को लूट ले गए। सोना एक व्यापारी था। कल तक सोना के पास सबकुछ था। लेकिन आज लुटेरों ने उसे कंगाल बना दिया था।
सुबह गांव की पंचायत बुलाई गयी। लेकिन कोई भी सोना की मदद के लिए आगे नहीं आया। उल्टे सोना के जो देनदार थे उन्होंने कर्ज चुकाने का बहाना लेकर सोना के घर पर कब्ज़ा कर लिया।
सोना अब मजबूर था। अब वह अपनी पत्नी और बेटे का पालन उस गांव में नहीं कर सकता था। दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही थी। सोना अपने परिवार को लेकर जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल के किनारे ही उन्होंने एक लकड़ी का घर बनाया और वही रहने लगे। अब जंगल ही उनका सहारा था। वहीं से उन्हें खाने को जंगली फल, कंदमूल आदि मिल जाता।
सोना एक दिन जंगल की खाक छान रहा था। तभी उन्हें कुछ आदिवासी मिले, वो जंगल से लकड़ियाँ जमा कर रहे थे। सोना उनसे बात करना चाहता था। लेकिन सोना उन आदिवासियों की भाषा नहीं समझ पा रहा था। सोना उनके पीछे पीछे चलने लगा। लगभग एक घंटे तक वो उनके पीछे लगा रहा। आदिवासियों ने सोना को देख लिया था कि वो उनका पीछा कर रहा है। उनलोगो ने उसे पकड़ लिया और रस्सी से हाथ पैर बांध दिया। एक ने उसे लकड़ी की तरह सर पर रख लिया और एक अँधेरी गुफा में ले जाकर बंद कर दिया।
इसी तरह कई घंटे गुजर गए। रात को गुफा का दरवाजा खुला। सोना ने देखा कई बंदूकधारी सामने खड़े थे। सबने चेहरे पर नकाब डाल रखा था। एक ने सोना को जोर का तमाचा लगाया। और गुर्राते हुए पूछा, तुम हमारे आदमियों का पीछा क्यों कर रहे थे ? सोना रोने लगा। उसने रोते हुए बताया कि उसके घर को लुटेरों ने लूट लिया और उसके पास अब कुछ भी नहीं है। वह अपने परिवार को दो जून का खाना भी नहीं दे पा रहा है। अब बंदूकधारियों ने समझ लिया था कि वो पुलिस वाला तो नहीं है। सोना को अब वो कही दूसरी जगह ले जाने लगे।
आधे घंटे जंगल के अंदर चलने के बाद वो सब एक किलेनुमा गाँव में पहुंच चुके थे। सोना को एक बड़े से घर के अंदर लाया गया। सामने कुर्सी पर एक ६० साल का आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। उसने बोलना शुरू किया, मै “शेरा” हूँ, इन लुटेरों का सरदार। सोना तुम्हारे घर को हमने ही लूटा था। इस तरह से हम तुम्हारे दोषी हुए। लेकिन एक बात बताओ, तुम्हारी मदद किसी ने क्यों नहीं की ? तुम तो बहुत भले आदमी थे। तुमने तो गाँव के जरुरतमंदो को मुफ्त में राशन दिया था। लेकिन जब तुम्हे जरुरत हुई तो क्यों किसी ने तुम्हारी मदद नहीं की ?
सोना चुपचाप था। वह भी अपने गांव वालों के व्यवहार से खुश नहीं था। शेरा ने आगे बोलना शुरू किया, आज तुम्हारे पास अपने परिवार को पालने के लिए कुछ भी नहीं है। मै तुम्हे अगर अपने लुटेरों के समूह में शामिल कर लूँ तो क्या तुम हमें माफ़ कर दोगे ? सोना अभी भी चुप था। लेकिन शेरा ने उसके चेहरे के भावों को पढ़ लिया। उसने सामने से एक बन्दुक उठा कर सोना के कंधे पर टांग दिया। और बोला आज से तुम इन लुटेरों के साथ काम करोगे।
सोना बाकी लुटेरों के साथ घर से बाहर आ गया। सब कहीं जाने को तैयार हो रहे थे। एक घोड़े पर सोना को भी एक अन्य लुटेरे के साथ बैठाया गया। सारे घोड़े थोड़ी देर में हवा से बातें करने लग गए। सोना ने साथी लुटेरे को कस कर पकड़ रखा था। रात के अँधेरे में भी घोड़े बड़ी कुशलता के साथ चल रहे थे। अब सब किसी गांव में पहुँच चुके थे।
सोना को जाने क्यों ये गाँव कुछ जाना पहचाना लग रहा था। सब घोड़े एक घर के बाहर रुक गए। ये घर सोना का ही था, जिसपर उसके बकायेदारों ने कब्ज़ा कर लिया था। सब लुटेरों ने मिलकर फिर से उस घर को लूट लिया। काफी माल हाथ लगा। सोना बस अपनी फटी आँखों से सब देख रहा था। सभी लुटेरे अब वापस लौटने को हुए। सोना भी लुटेरों के साथ वापस लौट गया। अड्डे पर पहुंचने पर सबने लुटा हुआ माल शेरा के घर पर रखा और बाहर आकर किसी का इंतज़ार करने लग गए।
शेरा अपने घर से बाहर आया तो उसके हाथ में एक बड़ा टिफिन बॉक्स था। उसने उसे सोना को थमाया और एक लुटेरे को आदेश देते हुए बोला, सोना को उसके परिवार तक छोड़ आओ। घोड़े पर सवार होकर सोना फिर निकल पड़ा। आधे घंटे में ही सोना अपने जंगल के किनारे वाले घर में पहुंच चूका था। दूसरा लुटेरा सोना को वहां छोड़ वापस लौट गया।
सोना घर के अंदर दाखिल हुआ। लकड़ी के अलाव के किनारे उसका बेटा माँ की गोद में सर रख कर सो रहा था। उसकी पत्नी उसे देखते ही भागी हुई आई और उससे लिपट गयी। बेटा भी जग चूका था, वो भी आकर दोनों से लिपट गया। तीनो थोड़ी देर रोते रहे। पत्नी ने फिर पूछा, आप कहाँ चले गए थे ? सोना ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर थोड़ा रुक कर बोला,आप सब के लिए खाना लेकर आया हूँ।
सबने कई दिनों से अनाज नहीं खाया था। तीनो एक साथ बैठकर खाने लगे। सबने भर पेट खाना खाया। रात बाकी था। पत्नी और बेटा सो चुके थे लेकिन सोना की आँखों में नींद नहीं था। उसके दिमाग में बार-बार एक सवाल आ रहा था, गुनहगार कौन है ? किसने उसका घर लुटा ? क्या उसने खुद लुटा ? या फिर उसने दूसरों को लूटने क्यों दिया ? सोना जब कल से काम पर जायेगा, उसे हर दिन इस सच का सामना करना पड़ेगा।
** ये कहानी काल्पनिक है। इसका उद्देश्य सिर्फ पाठको का मनोरंजन करना है। उपरोक्त फोटो “गूगल फोटो” से लिया गया है, जो सिर्फ कहानी को दर्शाने के लिए है। हम इसके लिए उनके आभारी है।
