श्रीमद् भगवदगीता के उपदेश

श्रीमद् भगवदगीता के उपदेश सबसे  बड़े धर्मयुद्ध महाभारत के रणभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने शिष्य अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने दिए थे। ५ हज़ार से ज्यादा वक़्त बीत गया है लेकिन गीता के ये उपदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक है और हमारे जीवन में हमारा मार्गदर्शन भी करते है।

कुरूक्षेत्र युद्ध में अर्जुन अपने सामने भीष्म, गुरू द्रोण एवं अन्य बन्धु-बान्धवों को देखता है तो वह मोहवश व्याकुल हो जाता है। उसका गांडीव (धनुष) उससे उठ नहीं पाता। ऐसी परिस्थिति में उसके रथ के सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण उसे जो उपदेश देते है वही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता में हैं। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन‘ इस समस्त गीता का सार तत्व है। श्रीकृष्ण कहते हैं-


“हे अर्जुन! तू मोह में न पड़, भविष्य की चिन्ता मत कर क्योंकि फल तेरे हाथ में नहीं है। तू जिनके प्रति अनुरागी हो रहा है वह असत्य का साथ दे रहे हैं और तेरा कर्म है असत्य से युद्ध करना। बिना किसी व्यक्तिगत रूचि, मोह अथवा आवेश के परिस्थिति के अनुरूप उपयुक्त मार्ग का अनुसरण करना ही तेरा कर्तव्य है। तू कर्मवीर बन और कर्म कर।”

  • “क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है। जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।”
  • “तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया।”‘
  • “खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।”
  • “परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।”
  • “न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है – फिर तुम क्या हो?”
  • “तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है। जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंद अनुभव करेगा।”

भगवद गीता संस्कृत भाषा में लिखी गई एक कविता है। इसके 700 छंद  कई प्राचीन भारतीय काव्य छंदों में संरचित हैं , जिनमें प्रमुख श्लोक ( अनुष्टुभ चंदा ) है। इसमें कुल 18 अध्याय हैं। गीता की रचना की तिथि के सिद्धांत काफी भिन्न हैं। कुछ विद्वान 5वीं शताब्दी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक की तारीखों को संभावित सीमा के रूप में स्वीकार करते हैं। भगवद गीता के रचयिता वेदव्यास जी है।      *इस आर्टिकल के लिए सामाग्री ऑनलाइन उपलब्ध विभिन्न साइट्स से ली गई है जो हिन्दू धर्मग्रन्थ भगवद गीता के बारे में है।

Oh hi there 👋
It’s nice to meet you.

Sign up to receive awesome content in your inbox, every month.

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.

Unknown's avatar

Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

You may also like...

Leave a Reply

Discover more from सतरंगी हिंदी

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading