बुढ़िया मामा और उनका बकरा
सकरी नदी से सटा एक गांव है, नन्द नगर। इस गांव के किनारे पर एक बुढ़िया मामा रहती है। इनकी कोई औलाद नहीं है। हाँ एक है जिसे बुढ़िया मामा बहुत प्यार करती है, वो है उनका बकरा। सुबह से शाम वो बकरे को चराने नदी किनारे जाया करती है। रात को भी बकरा घर के अंदर ही रहता है। एक तरह से बकरा बुढ़िया मामा का बेटा ही है।
एक बार की बात है, होली का समय आने वाला था। गांव के सरपंच गांव में सबका हाल चाल पूछने निकले थे। बुढ़िया मामा के घर भी पहुंचे। मामा से बात करते हुए अचानक से उनकी नज़र बकरे पर गयी। वह काफी हष्ट पुष्ट था, वजन भी २० से ३० के आस पास होगा। सरपंच साहब तो बकरे पर लट्टू हो गए। उन्होंने बुढ़िया मामा को बयाना देते हुए कहा कि इस बार की होली में हम आपके बकरे की बलि देंगे। गांव में एक प्रचलन था कि होली के दिन सरपंच और गांव वाले मिलकर एक बकरे कि बलि चढ़ाते थे। बुढ़िया मामा कतई अपने बकरे को बेचना नहीं चाहती थी।
बुढ़िया मामा घर के अंदर जाकर रोने लगी। कुछ देर बाद बकरे की नज़र उनपर पड़ी। वह उनके पास गया और रोने का कारण पूछा। बुढ़िया मामा ने उसे पूरी बात बताई। बकरे ने कहा बस इतनी सी बात है। आप मेरे लिए पकवान बना दो। मै पांच दिन के लिए कही दूर चला जाऊंगा। बुढ़िया मामा ने वैसा ही किया। खूब सारा सूखा पकवान बना दिया। बकरे नई अपनी पीठ पर पकवान और पानी लिया और घर से निकल पड़ा।
चलते चलते सुबह से शाम हो गई। अब जंगल का इलाका शुरू हो चूका था। उस इलाके में कोई भी नहीं था, चारो और शांति थी। बकरा घूम घूम कर सुरक्षित जगह की तलाश करने लगा। तभी उसकी नज़र एक बड़े और पुराने बरगद के पेड़ पर गई। पेड़ का तना तो मोटा था लेकिन उसके बीच खोहड था, उसमे कोई भी अंदर घुस कर बैठ सकता था। बकरे ने थोड़ा खाना खाया, पानी पिया और आराम से उस खोहड में जाकर बैठ गया।
अब रात हो चुकी थी। चारो और घना अँधेरा था। ये जंगल का बाहरी इलाका था, यहाँ जंगली जानवर कम ही आते थे। हर तरफ शांति थी। बकरा कुछ देर तो बैठा रहा लेकिन समय बीतने के साथ उसे नींद आने लगी और वो सो गया। आधी रात को अचानक से उसकी नींद खुली। उसे लगा आस पास कोई है। खोहड से बाहर झांक कर देखा। बरगद के पेड़ के नीचे कुछ लोग बैठे थे। उनके पास कुछेक गठरियाँ थी। थोड़ी देर तक तो उन्होंने इधर उधर के बात की, फिर वो उन गठरियों को खोलने लगे। उनके अंदर सोने चाँदी के जेवर पड़े थे।
बकरा पूरी बात समझ गया। ये लोग चोर थे और अवश्य ही कही से बड़ा हाथ मार कर आ रहे थे। यहाँ बैठकर ये सब अपना अपना हिस्सा बाँट रहे थे। बकरे के दिमाग में कुछ सुझा। बकरे ने अपने मुंह पर कपड़ा रखा और भारी आवाज़ में बोलना शुरू किया।
“भाई लोग, तुम लोगो ने मेरा हिस्सा नहीं दिया, तुम लोग बरगद के नीचे बैठकर बरगदी बकरे को भूल गए। मै चप्पे चप्पे पर नज़र रखता हूँ , चलो मेरा हिस्सा निकालो।”
चोरो का जोर का झटका लगा। एक तो चारो और घना अँधेरा था, ऊपर से भूतों जैसी डरावनी आवाज़। उसमे से एक चोर जो थोड़ा समझार था , बोला डरो मत, शायद ये हमारा भ्रम है वरना इस जंगली इलाके में कौन आता है। वे फिर अपने काम में लग गए। थोड़ी देर बाद बकरे ने बरगद के अंदर से फिर डरावनी आवाज़ बनाकर बोलना शुरू किया।
“मेरा हिस्सा तुम लोग कब दोगे? क्या तुम लोगो को इस इलाके से वापस नहीं जाना है? क्या तुम लोगो को बरगदी बकरे का कोपभाजन बनना है?”
इतना सुनना था कि चोरो के रही-सही हिम्मत जबाब दे गई। वे सबकुछ छोड़कर वहां से जान बचाकर भागे। थोड़ी देर चारो ओर शांति रही। बकरा खोहड से निकला और सारी पोटलियां लेकर वापस आ गया। इसी खोहड में रहते हुए बकरे ने पांच दिन कांटे। अब होली खत्म हो चूका था।
अगली सुबह बकरे ने अपनी पीठ पर गठरी लादा और चल पड़ा वापस अपने गांव की ओर। शाम से पहले वो बुढ़िया मामा के घर पहुँच चूका था। बुढ़िया मामा बकरे को जिन्दा देख, फूली नहीं समाई। बकरे ने सारी गठरियाँ बुढ़िया मामा के हवाले कर दिया। उन्होंने जब गठरियों को खोला तो उनकी आँखे चुंधियाँ गई। उन्होंने पहले कभी इतना सोना चाँदी नहीं देखा था।
अब बुढ़िया मामा ने अपने लिया नया घर घर बनवाया। घर के अंदर एक कुआँ भी था और उससे जुड़ा एक बगीचा भी। बगीचे में पेड़ पौंधों के अलावा हरी घास भी उगी थी। बुढ़िया मामा और बकरा अपने नए घर में ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे।
**साभार : दादा जी की जुबानी सुनी कहानियां