धर बुढ़िया खिचड़ी, सहलाओ मेरी पुछरी

मंगलगढ़ के घने जंगलों के बीचोबीच एक गांव है दौलतपुर | उसी गांव में एक बुढ़िया दादी रहती है | एक बेटा है उनका श्याम | श्याम के पास लगभग दो बीघा जमीन है | वो उन्ही में काम करता है | वह बहुत मेहनती है | उन खेतो में उगाये अनाज से श्याम और उनकी माता जी का भरण पोषण चल रहा हैI 

श्याम सुबह से शाम तक खेतों में रहता है | उनकी माँ दोपहर में रोजाना उसे खाना पहुचाने जाती है | आज भी माता जी खाना पहुंचाने खेतों पर जा रही है | रास्ता जंगलों के बीच से होकर जाता है | अभी माता जी आधे रास्ते ही पहुंची होंगी कि एक सियार झाड़ियों के बीच से निकलकर रास्ते पर खड़ा हो जाता है | सियार उन्हें घूरता रहता है और माता जी बोलता है ” धर बुढ़िया खिचड़ी, सहलाओ मेरी पुछरी ” | माता जी सियार को देखते ही  डर  गई | वह बेटे के लिए बनाया खिचड़ी सियार के सामने रख देती है | सियार खिचड़ी खाकर डकार लेता है और वापस से झाड़ियों में गुम हो जाता है |

अब तो यह सिलसिला सा बन गया है | माता जी को सियार बीच रास्ते में घेरता है और खिचड़ी खा जाता है | माता जी सियार से डरी हुई थी इसलिए उन्होंने ये बात किसी को नहीं बताई लेकिन उन्हें अच्छा भी नहीं लग रहा था कि बेटे का खाना रोजाना सियार को दे दें | एक दिन हिम्मत करके उन्होंने सारी बात बेटे को बताई | श्याम उनकी बातें सुनकर हसने लगा लेकिन उसने सियार को सबक सिखाने का ठान लिया |

अगली दोपहर फिर माता जी खिचड़ी लेकर खेतो की ओर चल पड़ी | रास्ते में सियार खड़ा है | वह गुर्राते हुए माता जी से कहता है ” धर बुढ़िया खिचड़ी, सहलाओ मेरी पुछरी |” आज माता जी खिचड़ी उसके सामने रखने के बाद प्यार से उसका पूंछ सहलाने लगाती है | वह सियार से कुछ इधर उधर की बातें करती है फिर उसे अपने घर आने का निमंत्रण देती है | वह बोलती है , सियार बेटा तुम भी तो मेरे बेटे के जैसे ही हो, हमने हमारे घर में दावत रखा है, तुम भी आना | वहां खाने को अच्छे पकवान मिलेंगे |

सियार तय समय पर माता जी के घर पहुँच जाता है | माता जी उसे मेहमान वाले कमरे में बिठाती है | पानी पीने को देती है ओर थोड़ा इंतज़ार करने को कहकर अंदर चली जाती है | वह चूल्हे पर खाली कढ़ाई गर्म होने को चढ़ा देती है | गर्म कढ़ाई पर थोड़ा थोड़ा ठंडा पानी डालती है | पानी पड़ते ही कढ़ाई से छन-गर -गर की आवाज होती है | मेहमान वाले कमरे में बैठा सियार सब सुन रहा होता है | बहुत सारे पकवान ओर अच्छा खाने के बारे में सोचकर सियार के मुंह में पानी आने लगता है | उससे इंतज़ार नहीं हो रहा है | उसकी जीभ लप-लपा रही है |

अचानक से कई लोग हाथों में डंडा लिए मेहमान वाले कमरे में घुसते है ओर आराम से बैठे सियार पर टूट पड़ते है | सियार चीखता चिल्लाता है लेकिन उसकी सुनाने वाला कोई नहीं है | वह जान बचाकर किसी तरह वहां से भागता है | वह चल नहीं पा रहा है, उसका पैर ओर पीठ जख्मी है. फिर भी वो दौड़ता ही जा रहा है | अब वो शायद कभी वापस इस गाँव में नहीं आएगा 

श्याम, माता जी ओर गांव वाले साथ में बैठे है | आज एक ही जगह सब खाना खा रहे है | श्याम माता जी से कहता है माँ ऐसी मुश्किलों में घबराया मत करो, हम सब के रहते हुए आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता | अगले दोपहर माता जी कुछ अच्छे पकवान लेकर दोपहर को घर से खेतों की ओर चली है | रास्ते में वो चारो ओर देखती जा रही है | लेकिन सियार उन्हें कहीं नहीं दिखा | आज वो खेतों में पहुंच कर श्याम को खाना खिलाती है | दोनों आज खुश है |

** साभार – दादा जी की जुबानी सुनी कहानियाँ.

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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