मेढक का निर्णय

एक हरे भरे बगीचे में एक मेढक रहता था। वह कभी इधर कभी उधर उछलता रहता था। बगीचे का माली एक दिन बगीचे के मध्य में छोटे से चूल्हे पर एक घड़े में पानी गर्म कर रहा था। तभी मेढक उछलता हुआ आया और गलती से उस घड़े में कूद गया। 

घड़े का पानी तब तक गर्म नहीं हुआ था वह उसमे खेलने लगा। थोड़ी देर में थोड़ा पानी गर्म हुआ तो मेढक पानी के अनुसार अपने शरीर का तापमान बढ़ाने लगा। अब वह आराम से फिर से पानी में खेलने लगा। पानी थोड़ी में और गर्म हुआ तो मेढक ने शरीर के तापमान को और बढ़ाया और खुद तो गर्म पानी में एडजस्ट कर लिया। 

लेकिन ये ज्यादा देर नहीं चल पाया।  अब तक पानी बहुत गरम हो चूका था। मेढक का शरीर जलने लगा। अब मेढक घड़े से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। वह घड़े के बाहर छलांग लगाता लेकिन बाहर तक जा नहीं पाता और वापस से घड़े में गिर जाता। वह कोशिश करता रहा लेकिन बाहर नहीं निकल पाया। वह घड़े में ही जल कर मर गया। 

अब सवाल ये है कि मेढक जो काफी लम्बी छलांग लगा सकता है वह एक छोटे से घड़े से बाहर क्यों नहीं निकल पाया ?

क्यूंकि मेढक ने अपना ज्यादा वक़्त गर्म होते पानी में खुद को एडजस्ट करने में ही गवां दिया। उसने अपनी सारी एनर्जी भी इसमें ख़त्म कर दिया। और जब उसने बाहर निकलने का निर्णय लिया, तब तक देर हो चुकी थी , अब उसमे इतनी एनर्जी नहीं थी कि वह घड़े से बाहर निकलने लायक बड़ी छलांग लगा पाए। 

Moral : मेढक ने बाहर निकलने का सही निर्णय तो लिया लेकिन वह सही समय पर नहीं लिया गया। अतः सही निर्णय अगर सही समय पर लिया जाये तभी कारगर होता है। 

**साभार : दादा जी की जुबानी सुनी कहानियां

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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