माँ तो माँ है
एक बच्चा अकेला है, जाने कहाँ से आया है और कहाँ को जाना है। बस चलता जा रहा है। बच्चा आगे बढ़ रहा होता है, तभी सामने कुत्ते के दो बच्चे खाने के लिए झगड़ते नजर आते है। एक रोटी का टुकड़ा है। दोनों पिल्ले उसे कभी अपनी तरफ तो दूसरी तरफ खींच रहे है। रोटी कई टुकड़ो में टूटकर जमीन पर बिखर जाती है।
बच्चा जो भूखा है, वो भी इन टुकड़ो की तरफ भागता है। जमीन पर से एक रोटी का टुकड़ा उठा कर मुंह में डाल लेता है। दोनों पिल्ले एक दूसरे की तरफ देखते है। एक पिल्ला बच्चे से पूछता है, क्या तुम्हारी मां ने आज तुम्हे खाना नहीं दिया ? तभी दूसरा पिल्ला बोलता है, क्या तुम हमारे घर चलोगे, वहां हमारे पास बहुत सी सूखी रोटियां है। बच्चा ना में सर हिलाता है और आगे बढ़ जाता है।
बच्चा आगे बढ़ता रहता है। हवा की ठंढक मौसम को ठंढा कर रही है। बच्चे के हाथ पांव भी ठंढ से सिकुड़ रहे है। तभी सामने से एक कुत्तिया आती नज़र आती है। पीछे खड़े दोनों पिल्ले दौड़ पड़ते है और कुत्तिया से लिपट जाते है। कुत्तिया एक जगह रुकती है और दोनों पिल्लो को अपने से चिपकाकर बैठ जाती है। अब पिल्लों को ठंढ नहीं लग रही है।
बच्चा ये देखकर उनकी और भागता है और कुत्तिया से चिपक कर बैठ जाता है। दोनों पिल्ले फिर से एक दूसरे की तरफ देखते है। एक पिल्ला बच्चे से पूछता है, क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए गर्म कपडे नहीं लिए। दूसरा पिल्ला पूछता है, क्या तुम हमारे घर चलोगे ? हमारा घर एक बड़े से पेड़ के नीचे है, जहाँ बिलकुल ठंढ नहीं लगती है। बच्चा फिर से इंकार में सर हिलाता है और आगे बढ़ जाता है।
बच्चा आगे बढ़ता जा रहा है। रास्ते में अब बड़े बड़े पत्थर है, जिन्हे पार कर के ही आगे जा सकते है। बच्चा एक पत्थर पर चढ़ रहा होता है। तभी वो फिसल कर नीचे गिर जाता है। उसे चोट लगती है और वो रोने लगता है। बच्चा सामने देखता है। एक पिल्ला भी पत्थर पर चढ़ते हुए गिर पड़ा है। उसे भी चोट लगी है। लेकिन पिल्ला कुत्तिया से लिपट गया है।
कुत्तिया ने उसे प्यार से दुलारा और सहलाया तो पिल्ला फिर से सामान्य हो गया। बच्चा ये देखकर कुत्तिया की तरफ भागा और उससे लिपट गया। दोनों पिल्ले फिर से एक दूसरे की तरफ देखते है। एक पिल्ला पूछता है, क्या तुम्हारी माँ तुम्हारा ख्याल नहीं रखती ? दूसरा पिल्ला पूछता है क्या तुम हमारे घर चलोगे, वहां हमने मुलायम घास बिछा रखा है , जिसपर गिरने पर चोट भी नहीं लगती। बच्चा ना में सर हिलाता है और आगे बढ़ जाता है।
बच्चा आगे बढ़ता जा रहा है। रास्ते में अब एक छोटा सा नाला है। बच्चा इसे पार नहीं कर सकता है। बच्चे को सामने फिर वही कुत्तिया दिखाई पड़ती है, जो अपने दोनों पिल्लो के साथ नाला पार करना चाह रही है। पिल्लों की हिम्मत नहीं हो रही कि वो नाले में जाएँ। कुत्तिया अपने दोनों बच्चो को अपने पीठ पर बिठा लेती है, और नाले की तरफ बढ़ने लगती है। बच्चा ये सब देख कर उसकी तरफ भागता है और कुत्तिया की पीठ पर बैठ जाता है। सारे सकुशल नाला पर कर लेते है।
अब घर आ चूका है। माँ अपने बच्चे को सकुशल देखकर हैरान है। वह अपनी बाहें खोल कर बच्चे को अपने पास बुलाती है। लेकिन इस बार बच्चा भागता नहीं है। वह कुत्तिया से पास ही, दोनों पिल्लों के साथ खड़ा है। कुत्तिया अपने घर की तरफ बढ़ती है। थोड़ी ही दूर पर एक बरगद का पेड़ है, जिसकी जड़ो के पास खाली जगह में उनका सुरक्षित ठिकाना है।
सब वहां पहुंच कर सुस्ताने के लिए बैठ जाते है। बच्चा भी पिल्लों के साथ नरम घास वाली चादर पर बैठता है। थोड़ी देर बाद वह उठता है, अपने दोस्तों को गले लगाकर उनका धन्यवाद करता है और फिर से मिलने का वादा करके वह अपने घर की तरफ चल देता है।
माँ अब भी इंतज़ार कर रही है। इस बार बच्चा भागकर माँ के गले लग जाता है। माँ को गर्व है अपने बच्चे पर। उसका खोया बच्चा घर लौट आया है। वह कुत्तिया को नम आँखों से धन्यवाद देती है। एक माँ से बेहतर अपने बच्चों को कौन समझ सकता है।
** ये कहानी काल्पनिक है।