मुसाफिर और मंजिल

 मै मुसाफिर चला था अपने राह पर,

उम्मीदों का दामन था साथ में, 

कुछ कर पाने की ऊर्जा थी हाथ में, 

लोगों ने कहा मान जा, रुक जा,

इस समय के बहाव में बह जायेगा, 

तू आज ना रुका तो मिट जायेगा। 

मै मुसाफिर चला था अपने राह पर,

थोड़ी दूर गया था, कुछ पुराने यार मिले,

महफ़िल सजी और जाम से जाम मिले, 

नशे ने सबकुछ भुला दिया, ना गम रहा ना धम,

आधी रात को आखें खुली तो एक सवाल आया,

क्या तू बह गया है, समय के बहाव में,

झटके से मै उठा निकल पड़ा शमशान से। 

मै मुसाफिर चला था अपने राह पर,

थोड़ी दूर गया था, कुछ पुराने रस्ते मिले,

सुंदरी अब भी थी मेरे इंतज़ार में,

बातें हुई हाथो से हाथ मिले,

कसमे ली एक दूजे से अलग ना होंगे,

शबाब ने सबकुछ भुला दिया, ना गम रहा ना धम,

आधी रात को आखें खुली तो एक सवाल आया,

क्या तू बह गया है, समय के बहाव में,

झटके से मै उठा निकल पड़ा शमशान से। 

मै मुसाफिर चला था अपने राह पर,

थोड़ी दूर गया था, पैरों में थकान होने लगी,

कब तक चलुंगा, कुछ ना मिलेगा यहाँ,

चारपाई उधार की थी, पैर फैला कर सो गया,

आराम ने सब कुछ भुला दिया, ना गम रहा ना धम,

आधी रात को आखें खुली तो एक सवाल आया,

क्या तू बह गया है, समय के बहाव में,

झटके से मै उठा निकल पड़ा शमशान से। 

शराब, शबाब, आराम ने था मुझे सबक सिखाया,

रास्ते से भटकोगे तो रास्तें खत्म हो जायेंगे,

सही दिशा और दृढ निश्चय मंजिल तक पहुचायेंगे,

लोगों की ना सुन, तू गर रुका तो मिट जाएगा,

चलता रहा तो जियेगा भी और जीत जाएगा।

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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