हाथों की लकीरों में बहुत कुछ लिखना बाकी है.
रंग बिरंगे सपनो में खोया रहता है वो,
पैर फैलाकर बिस्तर पर सोया रहता वो,
रेत की तरह हाथो से वक़्त फिसल रहा है,
किस्मत का ‘दीया’ खुद को ढूंढता फिर रहा है.
पिता, वक़्त वे वक़्त उसे याद दिलाते है,
हाथो पर लकीरें लिखना बाकी है, समझाते है,
लेकिन वो मेहमान है किस्मत का, ऊपर वाले पर
सब छोड़ फिर बिस्तर पर गिर जाता है.
समय तेजी से करवट बदलता है,
पैसा और पोजीशन अब उसे समझ आता है,
लेकिन अब पछतावे के सिवा कुछ न मिलता है,
पिता की कही बाते अब अक्सर याद आती है.
खुद पर भरोसा और जीतने तक संघर्ष करना,
अब उसका आगे का रास्ता बनाएंगे,
अभी जगा है तो क्या हुआ, अभी भी
हाथों की लकीरों में बहुत कुछ लिखना बाकी है.