हिंदी भाषा और स्वतंत्रता आंदोलन

 हिंदी की महत्ता तभी स्थापित हो गई थी जब वह स्वाधीनता संग्राम के समय समूचे देश को आपस में जोड़ने वाली सबसे सशक्त संपर्क भाषा बन गई थी। उस दौर के सभी नेताओं का मानना था कि अगर कोई भारतीय भाषा देशवासियों को एकजुट करने में सहायक बन सकती है तो वह हिंदी ही है। हिंदी की सामर्थ्य को गांधी ने भी समझा और नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने भी। आचार्य बिनोवा भावे ने कहा था कि यदि मैंर्ने हिंदी का सहारा न लिया होता तो कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से केरल तक के गांव-गांव में जाकर मैं भूदान, ग्राम-दान का संदेश जनता तक न पहुंचा पाता।

हिंदी में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र

उस दौर में प्रकाशित होने वाली हिंदी पत्रिकाओं ने स्वंतंत्रता संग्राम में अहम् भूमिका निभाई। 30 मई 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ नाम से पहला हिंदी भाषा का अखबार का प्रकाशित हुआ, जिसे पंडित जुगल किशोर शुल्क ने कलकत्ता से प्रकाशित किया था। हालांकि आर्थिक समस्याओं के कारण ये समाचार पत्र लंबे समय तक प्रकाशित नहीं किया जा सका। लेकिन इसने देसी भाषा में प्रेस को प्रोत्साहन दिया और देश के कोने-कोने में राष्ट्रवादी धारणा पहुंचाने में सहायता की।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने1868 में काशी से ‘वचन सुधा’ के प्रकाशन के माध्यम से हिंदी लेखकों को प्रेरित किया। इस पत्रिका के माध्यम उन्होंने जन चेतना लाने का कार्य किया और स्त्री पुरुष समानता का समर्थन किया। उन्होंने भारत के स्व-शासन और संपूर्ण संप्रभुता का स्वप्न देखा।

हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में भारतेंदु के युग को न सिर्फ हिंदी भाषी लोगों में जागरूकता का स्वर्णकाल माना जाता है बल्कि इसने ब्रिटिश दमन का भी कड़ा प्रतिकार किया। 1903 में ‘सरस्वति’ के संपादक का दायित्व महावीर प्रसाद द्विवेदी पर आ गया और हिंदी पुनर्जागरण आरंभ हुआ। इस युग के दौरान कविता में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याएं मुखर हुई जबकि गीतों में सामाजिक जागरण को प्रमुखता मिली।

हिंदी में प्रकाशित अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाएं

1907 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने प्रयाग से साप्ताहिक साहित्य का प्रकाशन का शुरू किया और उसी वर्ष माधव राव सप्रे ने नागपुर से हिंद केसरी निकाला। गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1910 में कानपुर से ‘जोशिला’ और ‘क्रांतिकारी’ साप्ताहिक प्रताप प्रकाशित किया, जो राष्ट्रवादी युवाओ की आवाज था।

हिंदी पत्रकारिता के लिए एक और महत्वपूर्ण योगदान 1913 में ‘प्रभा’ का प्रकाशन था, जिसे पहले कालूराम गंगराडे, माखनलाल चतुर्वेदी खंडवा से प्रकाशित करते थे। लेकिन बाद में 1919 में कानपुर की ‘प्रताप’ प्रेस से प्रभा का प्रकाशन निकलने लगा। प्रभा स्वतंत्रता संघर्ष के लिए एक समर्पित समाचार पत्र था। ‘प्रभा’ और ‘प्रताप’ के साथ ‘चांद’ भी एक महत्वपूर्ण पत्रिका थी। चांद से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रवाद के बीज बोए और स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता संघर्ष में सहायता करने के लिए 1920 में शिव प्रकाश गुप्त ने काशी से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू किया। 19 अगस्त 1919 को गांधी जी ने ‘नवजीवन’ का हिंदी संस्करण आरंभ किया। आचार्य शिवपूजन सहाय ने 1922 में मासिक पत्रिका आदर्श का संपादन शुरू किया। कोलकाता से 26 अगस्त 1923 से हिंदी साप्ताहिक मतवाला की शुरुआत हुई, जिसमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद सेठ, शिवपूजन सहाय, बेचैन शर्मा नवजादिक लाल श्रीवास्तव जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों को आकर्षित किया।

1928 से कोलकाता से ही बनवारी दास चतुर्वेदी ने विशाल भारत मासिक का संपादन आरंभ किया और 1933 में गांधी जी ने ‘हरिजन सेवक’ निकाला, जो अस्पृश्यता और गरीबी से उनकी लड़ाई का प्रमुख साधन बना 

आज़ाद भारत की हिंदी

हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर, 1949 को मिला और गोरतलब हो की संविधान सभा ने लम्बी चर्चा के बाद हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकारा । इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी थी। 

**साभार : ऑनलाइन उपलब्ध समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं से इस आर्टिकल के लिए सामग्री ली गयी है। हम इसके लिए उनका आभार व्यक्त करते है।

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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