कहानी विश्वास की
ये कहानी है एक राजा और एक रानी की। ये कहानी है उनके प्यार और समर्पण की। ये कहानी है है विश्वास की, यही विश्वास कि राजा सिर्फ रानी का है और रानी सिर्फ राजा की है।
गरुआ के जंगलो के भीतर एक छोटी सी रियासत थी, चंद्रपुर। यहाँ के राजा थे हरिनाथ। और साक्षी हरिनाथ की रानी थी। दोनों में काफी प्यार था। साक्षी परिवार के साथ साथ रियासत के कामकाज में भी हरिनाथ का हाथ बंटाती थी।
एक बार पड़ोस के जगतपुरा रियासत के राजा ने हरिनाथ के पास दोनों राज्यों के बीच व्यापार के अवसर ढूंढने के लिए अपनी बेटी चारुलता को चंद्रपुर भेजा। चारुलता काफी सुन्दर और तेज दिमाग थी। राजा के महल में ही एक कमरा चारुलता के लिए रखा गया।
व्यापर सबंधी अवसरों एवं चुनौतियों जैसे मुद्दों पर चारुलता के साथ राजा हरिनाथ की कई बार मुलाकात हुई। हरिनाथ काफी सुलझे हुए व्यापारी भी थे लेकिन चारुलता की व्यापर सम्बन्धी विषयवार जानकारी और हाज़िरजबाबी के सामने वो थोड़े फीके पड़ रहे थे। चारुलता ने मौके का फायदा उठाते हुए उनसे कई ऐसे व्यापर समझौते करवाए जो चंद्रपुर के लिए घाटे का लेकिन जगतपुरा के लिए फायदे का सौदा था। हरिनाथ बस ये सोचकर आगे बढ़ गए की व्यापर जब बढ़ेगा तो आखिर में इसका फायदा उनको भी मिलेगा ही।
इधर साक्षी, हरिनाथ और चारुलता की हरदिन मुलाकात से परेशान थी। चारुलता की खूबसूरती किसी से छिपी नहीं थी। साथ में उसकी वाकपटुता एवं उसका ज्ञान किसी को भी अपनी और आकर्षित करने के लिए काफी था। हद तो तब हो गई जब एक रात राजा चारुलता से मिलने उसके कमरे में पहुँच गए।
हरिनाथ और साक्षी दोनों ही सही थे। एक व्यापार के लिए सोच रहा था और एक अपने प्यार के लिए सोच रहा था। लेकिन अब तक किसी ने अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था। चारुलता आज सुबह वापस लौटने वाली थी। लेकिन रात में हीं किसी ने बेरहमी से उसका क़त्ल कर दिया।
अब शक की सुई तीनो तरफ घूम रही थी। जगतपुरा के राजा ये सोच रहे थे कि शायद व्यापर सबंधी शर्तें हरिनाथ को पसंद नहीं आई इसलिए हरिनाथ ने चारुलता का क़त्ल कर दिया। हरिनाथ सोच रहे थे साक्षी को चारुलता के साथ उसकी नजदीकियां पसंद नहीं आई इसलिए उसने चारुलता का क़त्ल कर दिया। जबकि साक्षी सोच रही थी, जगतपुरा के राजा व्यापारिक शर्तों को तो जीत गए थे लेकिन वो अपनी बेटी को हारने वाले थे, इसकारण चारुलता के जगतपुरा पहुँचाने से पहले ही उसका क़त्ल करवा दिया।
अंततः जगतपुरा के राजा ने चंद्रपुर पर हमला करने का आदेश दिया। चंद्रपुर छोटी सी रियासत थी। उनके पास सिमित सैनिक थे। वे जगतपुरा के सैनिको के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाए। हरिनाथ और साक्षी को बंदी बना लिया गया। दोनों को जगतपुरा के राजा के सामने पेश किया गया। राजा को अपनी बेटी खोने का बहुत गम था। हरिनाथ और साक्षी को देखते ही उनकी आँखों से अंगारे निकलने लगे। उन्होंने ने दोनों को अगले दिन सूली पर लटकाने का आदेश दिया। लेकिन राजा का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे अपने हांथों से दोनों का क़त्ल करना चाहते थे।
रात को जब हरिनाथ और साक्षी कारागार में कैद थे। जगतपुरा के राजा ने एक अंगरक्षक को बुला कर कुछ समझाया और उसे दोनों के पास भेज दिया। अंगरक्षक कारागार में वापस पहुंचा और हरिनाथ को पास बुलाकर बोला, महाराज मै आपके चंद्रपुर राज्य से हूँ। मै एक बार परिवार से बिछड़ कर इस राज्य में आ गया और फिर वापस नहीं जा पाया। मुझे अपना चंद्रपुर बहुत याद आता है। मै आपके प्राण बचाना चाहता हूँ। लेकिन मै आप दोनों में से किसी एक के ही प्राण बचा पाउँगा। क्योंकि यहाँ दो अंगरक्षक से ज्यादा एक साथ नहीं चल सकते। आपमें से जो कोई चलना चाहे मेरे साथ चल सकता है। किसी को शक नहीं होगा।
हरिनाथ साक्षी को बचाना चाहता था और साक्षी हरिनाथ को। दोनों एक दूसरे को समझाने में व्यस्त थे कि उनकी जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन सुबह तक भी कोई एक दूसरे को छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुआ। उधर जगतपूरा के राजा नंगी तलवार लेकर रात भर किसी के बाहर आने का इंतज़ार करते रह गए।
सुबह जगतपुरा के राजा ने साक्षी और हरिनाथ को छोड़ने का आदेश दिया। उनका राज्य उन्हें वापस देते हुए कहा, मुझे मालूम चल गया है, तुम दोनों के बीच सिर्फ प्यार है, ईष्या या द्वेष बिलकुल नहीं है। तुमने हमारी बेटी को नहीं मारा। हम आपको आजाद करते है। आपके साथ व्यापारिक समझौते भी हम शुरू कर रहे है।
काश मेरी बेटी ने सिर्फ प्यार को ही अपनाया होता। प्यार में छल ना होता। एक दूसरे के लिए खुद को कुर्बान करने का जज्बा होता। और सही है, आपकी दिशा सही हो तो जिंदगी चल ही पड़ती है।
** ये कहानी काल्पनिक है। किसी से समानता केवल एक संयोग है।