गरुआ की पुरानी हवेली (अध्याय ३)

सड़क के दोनों किनारों पर बड़े बड़े पेड़ है जो सड़क के ऊपर छतरी की तरह फैले हुए हैं।  सुबह की धुप खिली हुई है और ठंढी हवा बह रही है सैम गाड़ी ड्राइव कर रहा है और करिश्मा उसके बगल वाली सीट पर बैठी है।  हमलोग जंगल के अंदर की तरफ जा रहे है।  सामने नदी है जिसपर बहुत ही सकरा पूल है।  शायद ये अंग्रेजो के जमाने के ही बने है।  नदी के बाद जंगल और सघन हो गया है। अब तो सूरज के रौशनी भी जमीन पर हलकी हलकी ही आ पा रही है। प्रकृति ने खूबसूरती की छटा बिखेर रखा है चारो तरफ।  

सैम ने गाड़ी एक पुराने खंडहरनुमा किले के सामने रोक दिया।  करिश्मा ने उत्सुकता से पूछा, “क्या ये किसी राजा का किला है ? क्या यहाँ अब भी लोग रहते है? 

“मैडम आप चलकर खुद ही देख लो” सैम ने जबाब दिया।  

दोनों किले के अंदर दाखिल हुए।  सैम आगे आगे और करिश्मा उसके पूछे। आज सैम करिश्मा का गाइड बना हुआ था। दरअसल सैम की प्रॉपर्टी की डीलिंग शाम को होनी थी इसकारण से वो दिन भर फ्री था। राम सिंह के आग्रह करने पर सैम ने हाँ कर दिया था। चूँकि दीपक की तबियत ठीक नहीं है इसलिए करिश्मा ही सैम के साथ आ पाई थी। करिश्मा दीपक को हवेली में छोड़कर सैम के साथ नहीं आना चाहती थी लेकिन दीपक ने ही जोर दिया की तुम बैठकर क्यों बोर होओगी, जाओ थोड़ा घूम आओ, लेकिन जल्दी लौट आना। 

किला बहुत ही बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है ,लेकिन ये बाकियों से थोड़ा अलग है।  ज्यादातर किला ऊचे पहाड़ी या पठारी क्षेत्र में बना होता है।  इस किले का विस्तार जंगल के भीतर समतल मैदान के ऊपर था।  बड़े बड़े हाथी और घोड़ो की मूर्तियों से दीवारें सजी थी।  लेकिन हाँ समय के साथ अब इनकी चमक धीमी पड़ चुकी थी। करिश्मा ने दीपक से बातों का सिलसिला शुरू करते हुए पूछा, “क्या इस किले का सम्बन्ध भी आपकी फैमिली से है ?” 

“हाँ थोड़ा तो है, मेरे दादा जी ने इस जगह के चारो तरफ किले जैसी दीवार बनवाया था।  लेकिन मै आपको ये दिखाने नहीं लाया , मै आपको कुछ और दिखाने लाया हूँ।  आप मेरे साथ साथ ही चलते रहिएगा। “जैसा आप कहें’ कहकर करिश्मा ने सैम का हाथ पकड़ लिया। सैम को थोड़ी झिझक तो हुई, लेकिन वो मुस्कुराते हुए आगे बढ़ता रहा। 

किले के अंदर चारो ओर झाड़ियां उग आई थी। और अब रोशनी कम होती जा रही थी। सैम ने अपने पिठू बैग से टॉर्च निकाल लिया। सैम यहाँ पहले भी आ चूका है इसलिए वो इस जगह से वाकिफ है। लेकिन फिर भी वो सावधान है। एक पेड़ से उसने मजबूत डाली तोड़कर एक डंडा बनाया है जिससे वो रास्ते को साफ करता हुआ आगे बढ़ रहा है।  

सामने एक पहाड़ीनुमा ढलान था। सैम अभी किस तरफ से निचे उतरे ये सोच रहा था कि करिश्मा चट्टानों को पकड़ कर नीचे उतरने लगी। लेकिन उसका अचानक से पैर फिसल गया। वो नीचे की तरफ लुढ़कने लगी। सैम ने बिना कुछ सोचे नीचे की तरफ छलांग लगा दिया। उसने एक मजबूत बेल पकड़ कर करिश्मा को थाम लिया।

करिश्मा सैम से लिपट गई। सैम ने सँभलते हुए अपने बैग से रस्सी निकाला और ऊपर की तरफ फेका। ऊपर के एक पेड़ से वो अटक गया। रस्सी खींचकर मजबूती का अनुमान लगाया और करिश्मा को ऊपर जाने का इशारा किया।  करिश्मा ने भी अब तक खुद को सम्हाल लिया था। वो सावधानी से ऊपर आ गई। सैम भी उसके पीछे पीछे पहाड़ी के ऊपर आ गया। 

सैम ने अपने बैग से एक पुराना मैप निकाला और एक समतल जगह पर उसे फैला दिया। सूर्य की दिशा के अनुसार मैप को एडजस्ट किया। और खुद में बुदबुदाने लगा “अगर हम यहाँ से १.५ किलो मीटर उत्तर-पूर्व दिशा में चलेंगे तो हम वहां तक पहुँच सकते है। मैप को वापस से बैग में डाला और सावधानी से आगे बढ़ने लगा। 

थोड़ी ही दूर आगे बढे होंगे की करिश्मा ने अजीब सी हरकत की, अपने बैग से फल निकाल कर खाने लगी। ऊपर पेड़ो पर बैठे कुछ बंदरों ने ये देखा और उसने करिश्मा पर हमला कर दिया। करिश्मा बंदरों से बचने के लिए भागने लगी। सैम ये सब देख कर करिश्मा के पीछे भागा। उसने करिश्मा को जबरदस्ती कंट्रोल करते हुए उससे बैग छीनकर दूर फेक दिया। बन्दर बैग उठाकर वापस से पेड़ों पर चढ़ गए। 

करिश्मा अपना सर पकड़ कर जमीन पर बैठ गई। सैम ने उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, “कोई बात नहीं लेकिन आगे से ऐसी गलती मत करना”।  करिश्मा को इन सब की बिलकुल उम्मीद नहीं थी। थोड़ी देर रुकने के बाद सैम और करिश्मा फिर आगे बढ़ चले। 

अब जंगल कम घना रह गया था। धुप भी बराबर से जमीन पर आ रहा था। चलते चलते दोनों एक समतल मैदान में आ चुके थे। करिश्मा ने सामने की तरफ आश्चर्यचकित होकर देखते हुए पूछा, “ये क्या है?” 

“ये अमरपुरा के अवशेष है।” सैम ने जबाब दिया। करिश्मा और उत्सुक होते हुए बोली, “मुझे थोड़ा साफ़ साफ़ बताओगे?”

सैम ने बोलना शुरू किया, “कहते है जब आर्य भारत आये थे तब उसकी एक टुकड़ी इधर भी आयी थी। वो अमरपुरा जैसे नगर के विकास को देखकर दंग रह गए थे। उन्होंने चालाकी से यहाँ के कुछ मूल निवासियों के साथ मिलकर इस नगर पर कब्ज़ा कर लिया था। बाद में इस जगह को उन्होंने अपनी राजधानी बना लिया। अब यहाँ आर्यों के द्वारा किये गए विकास कार्यो को भी देखा जा सकता है।” 

करिश्मा को ये सब सपने जैसा लग रहा था।  उसने बस इतिहास के किताबों में ही ऐसे नगरों के बारे में पढ़ा था। आज खुद की आँखों से उसके अवशेष देखकर वो उत्साहित थी। उसे लग रहा था उसका इतने दूर इस जंगल के भीतर आना बेकार नहीं गया। लेकिन थोड़ा निराश होते हुए उसने सैम से सवाल किया, “लेकिन ये इतने वीरान क्यों पड़े है?’

सैम ने भी थोड़ा निराश होते हुए जबाब दिया, “शायद ये जंगल के इतने अंदर है , लोगों की पहुँच यहाँ तक नहीं है। मेरे दादा जी ने सरकार को एवं पुरातत्व विभाग को इसके बारे में कई चिट्ठी लिखा था, लेकिन उनकी उदासीनता देखकर खुद कुछ करने को सोचा और अपने खर्चे से इस जगह के चारों तरफ किलेनुमा दीवार बनवा दिया। करिश्मा ने अपने जेब से मोबाइल निकाला और उस जगह की तस्वीरें खींचने लगी। वो वापस जाकर इसके बारे में लोगों को जरूर बताएगी। 

सैम और करिश्मा एक चबुतरेनुमा जगह पर बैठ गए। सैम ने अपने बैग से पानी की बोतले और स्नैक्स निकाला और करिश्मा की तरफ बढ़ा दिया और मुस्कुराते हुए बोला, “मेरे बैग में थोड़ा बचा है, लो खाओ।” करिश्मा ने स्वीकारते हुए जबाब तो नहीं दिया लेकिन खिल खिलाकर हंसने लगी। दोनों वहां बैठकर लगभग घंटे भर बातें करते रहे। 

करिश्मा की बाते सैम को लुभा रही थी। वो खूबसूरत भी थी। उसके पास एक पक्की नौकरी भी थी। सैम को वो अपने लिए परफेक्ट मैच लग रही थी। एक बार तो उसके दिल में ये भी ख्याल आया कि वो हवेली की सेल की डील कैंसिल कर दे और करिश्मा के साथ यही बस जाये। लेकिन उसके दिमाग ने इस तरह के विचार को सिरे से नकार दिया I

दिन के लगभग तीन बजने वाले थे।  दोनों वापसी के लिए निकल पड़े। इस बार ज्यादा परेशानी नहीं हुई। आधे घंटे में ही वो किले के बाहर खड़ी गाड़ी तक पहुँच चुके थे। सैम ने ड्राइविंग सीट सम्हाला और हवेली की तरफ चल पड़ा। हवेली पहुँच कर उसने करिश्मा को ड्राप किया। करिश्मा ने कार से निकलने से पहले उसे एक प्यार की झप्पी दी और बोली,”थैंक्यू आज मेरा गाइड बनने के लिए, और आप चाहो तो कल मेरे और दीपक के साथ लव पॉइंट पर आ सकते हो। हाँ, एक बात और पिछले दिन जो तुम मेरे कमरे में घुस आये थे, उसके लिए मैंने तुम्हे माफ़ किया।” 

“यू आर वेलकम मैडम” सैम ने नज़रे झुकाते हुए कहा और हवेली की डील के लिए निकल पड़ा।

** इस कहानी का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।  उपरोक्त पिक्चर गूगल फोटो से ली गयी है, जो सिर्फ कहानी को दर्शाने के लिए है।

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Mukesh Prasad

दोस्तों, मेरा नाम मुकेश प्रसाद है। पेशे से मै एक बैंकर हूँ। मेरी हिंदी लेखनी में हमेशा से रूचि रही है खासकर कहानी, कविता और निबंध लेखन में। मेरी कोशिश होती है मै अपनी लेखनी से एक अच्छा मनोरंजक विषय उपलब्ध करा सकू। अगर आपको मेरी ये लेखनी पसंद आयी हो तो आप इसे अपने दोस्तों से जरूर शेयर करें।

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